फिल्म में शास्त्रीय संगीतज्ञ का योगदान – Classical Musician Contribution in Film

● फिल्म में शास्त्रीय संगीतज्ञ – भारतीय शास्त्रीय संगीतज्ञों का फिल्मों में योगदान प्रकृति के सौन्दर्य को स्थायित्व प्रदान करने के लिए ललित कलाओं का जन्म हुआ और ललित कलाओं में सबसे ऊँचा स्थान ‘ संगीत ‘ का माना गया है । शिक्षाविद् डॉ . निशा रावत जी के शब्दों में , ” संगीत विश्व का नैतिक विधान है , यह मानव मस्तिष्क में नवीन रंग और भावनाओं को रंगीन उड़ान देता है । संगीत निराशा में आनन्द का संचार करता है तथा विश्व के प्रत्येक पदार्थ में जीवन और उत्साह को अभिव्यक्त करता है ।

फिल्म में शास्त्रीय संगीतज्ञ – Classical Musician in Film

” हिन्दुस्तानी संगीत के मुख्य दो प्रकार हैं – ‘ शास्त्रीय संगीत ’ और ‘ भाव संगीत ’ । साधारण तौर पर शास्त्रीय संगीत उसे कहते हैं , जो शास्त्र के नियमानुसार प्रस्तुत किया जाए और भाव संगीत उसे कहा जा सकता है , जिसे कोई भी व्यक्ति सहज भाव में गुन – गुना उठे । दोनों में अन्तर केवल इतना है कि शास्त्रीय संगीत में विभिन्न राग – रागिनियों का प्रयोग किया जाता है ।

● आरम्भ में भारतीय शास्त्रीय संगीतकार अथवा कोई घरानेदार गायक ही फिल्म संगीत की रचना करते थे । यही कारण था कि शास्त्रीय संगीत आरम्भ से ही सिनेमा संगीत को खूबसूरत बनाता रहा है । इन सभी संगीतज्ञ, संगीत – निर्देशकों की रचनाएँ शास्त्रीय संगीत पर ही आधारित होती थीं ।

वर्ष 1931 से 1941 तक इसी प्रकार विभिन्न रूपों में घरानेदार फिल्म – संगीत के प्रयोग होते रहे । बॉम्बे टॉकीज से सरस्वती देवी व एस.एन. त्रिपाठी शुद्ध रागों की बन्दिशें थीं , तो प्रभात फिल्म से मराठी नाट्य संगीत प्रस्तुत होता था । बम्बइया फिल्मों में गजल , कव्वाली , ठुमरी एवं पारसी रंगमंच की धुन अधिक थी ।

वर्ष 1941 में लाहौर के पंचोली स्टुडियो से ‘ खजांची ‘ फिल्म में गुलाम हैदर ने फिल्म संगीत को एक नया मोड़ दिया । तबले की जगह ढोलक और घड़े का उपयोग तथा क्लाइमेट हारमोनियम की जगह टूंपेट और हवाईन गिटार का प्रयोग होने लगा । धुनों में पंजाबी रंग उभरा । हैदर के इस नए संगीत प्रयोग से प्रभावित होकर शास्त्रीय संगीतज्ञ खेमचन्द्र प्रकाश राजस्थानी लोक धुनों पर आधारित रचनाएं करने लगे , तो इधर नौशाद ने उत्तर प्रदेश की लोक – धुनों को अपने फिल्म संगीत का आधार बनाया ।

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‘ आलमआरा ‘ फिल्म के बाद फिल्मों में नृत्य और गति की परम्परा चलती रही , लेकिन सभी कलाकारों को स्वयं गाना पड़ता था । जब बोलती फिल्मों का दौर शुरू हुआ तो कथा संवाद और संगीत तीनों शक्तिशाली होने लगे । लोकसंगीत और शास्त्रीय संगीत ( लोकसंगीत और शास्त्रीय संगीत का पारस्परिक सम्बन्ध ) के विविध रूपों से फिल्मों में जान पड़ गई । अधिकतर फिल्मों में गीत शास्त्रीय संगीत पर आधारित होते थे । संगीत के निर्माण करने वाले संगीतज्ञ, संगीतकार भी बढ़ने लगे । यह वह दौर था जब फिल्म संगीत के द्वारा शास्त्रीय संगीत जन – जन के कानों तक पहुंच रहा था । ध्रुपद , धमार , तराना , कव्वाली , गजल , दादरा , भजन और लोकगीत फिल्मी दायरे में आकर जन – जन के पास पहुँचने लगे ।

फिल्म संगीत में शास्त्रीय संगीत का योगदान देने वाले अनेक संगीतज्ञ हुए , जिनकी कर्णप्रिय संगीत रचनाएँ न केवल संगीत के विद्वानों , बल्कि जनमानस के मानस पटल पर अंकित हुई । फिल्मों का प्रचार – प्रसार अधिक होने के कारण से शास्त्रीय संगीत ने जनसाधारण को भी आनन्दित किया ।

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शास्त्रीय संगीत के प्रकाण्ड विद्वान् ; जैसे- पण्डित भीमसेन जोशी , किशोरी अमोनकर , बड़े गुलाम अली खाँ , चित्रा , जगजीत सिंह , लक्ष्मीशंकर , गुलाम मुस्तफा खाँ , डी.वी. पलुस्कर , अमीर खाँ , मल्लिकार्जुन मंसूर , सवाई गन्धर्व , विनायक राव पटवर्द्धन , सरस्वती रानी , हीराबाई बड़ौदकर जैसे गायकों और पण्डित रविशंकर , अली अकबर खाँ , पन्नालाल घोष , हरिप्रसाद चौरसिया , विलायत खाँ , अब्दुल हलीम जफर खाँ , शिवकुमार शर्मा , अल्लारक्खा खाँ , बिस्मिल्ला खाँ , समता प्रसाद जैसे वादकों के योगदान से फिल्म संगीत का क्षेत्र निरन्तर सशक्त होता गया और यही कारण है कि वह आज लोक में व्याप्त होकर जन – जन का मनोरंजन कर रहा है ।

संगीत प्रधान फिल्म

पहली बोलती फिल्म ‘ आलमआरा ‘ से लेकर आज तक लाखों फिल्में बन चुकी हैं और कई लाख गाने रिकॉर्ड हो चुके हैं । फिल्म संगीत में शास्त्रीय संगीत के उपयोग के अनगिनत उदाहरण देखने को मिलते हैं ; जैसे – पाकीजा , बसन्त बहार , तानसेन , बैजूबावरा , गूंज उठी शहनाई , झनक झनक पायल बाजे , रानी रूपमती , नागिन , नवरंग , सरगम तथा नाचे मयूरी इत्यादि अनेक संगीत प्रधान फिल्मों ने भारतीय संगीत जगत पर एक अमिट प्रभाव छोड़ा है ।

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आज की फिल्मों में भी शास्त्रीय संगीत को आधार मानकर अनेक गीतों की रचना हो रही है ; जैसे – फिल्म उमरावजान , देवदास , आजा नचले , रॉकस्टार तथा आशिकी -2 जैसी फिल्मों में कई गीत शास्त्रीय संगीत पर आधारित हैं और इन गीतों की सफलता ने नए कीर्तिमान स्थापित किए हैं ।

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निष्कर्ष :-

निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि पहली बोलती फिल्मों से लेकर वर्तमान फिल्म संगीत की इतने वर्षों की यात्रा के बाद आज भी दर्शकों के वर्ग में बुद्धिजीवी दर्शकों की भरमार है , जोकि फिल्म संगीत में पाश्चात्य शैली के हावी होने के बावजूद शास्त्रीय संगीत पर आधारित गीतों को पसन्द करते हैं और खुले दिल से प्रशंसा करते हैं, जिसके परिणामस्वरूप फिल्म संगीत का स्तर निःसन्देह ऊँचा होगा ।

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