रवीन्द्र संगीत घराना – Rabindra sangeet gharana

रवीन्द्र संगीत संगीत का घराना • रवीन्द्र संगीत का उद्भव बंगाल में हुआ। यह संगीत इतना लोकप्रिय हो गया कि इसका प्रसार पूरे देश व विदेशों में भी हुआ। रवीन्द्र संगीत का आधार उत्तर भारतीय शास्त्रीय संगीत ही रहा। शास्त्रीय संगीत में परिवर्तन कर रवीन्द्र संगीत का जन्म हुआ।

रवीन्द्र संगीत का घराना

  • संगीत के विष्णुपुर घराने का प्रभाव रवीन्द्र संगीत पर अधिकाधिक था , इस घराने का प्रभाव रवीन्द्र संगीत पर पड़ने के कई कारण भी रहे । रवीन्द्रनाथ जी के समय में समस्त बंगाल पर विष्णुपुर घराने का प्रभाव था और इस घराने की ख्याल एवं ध्रुपद गायन शैलियाँ प्रचलित थीं । इस घराना में संगीत के भाव तथा शब्दों पर विशेष ध्यान दिया जाता था और यह सरल एवं गम्भीरता से पूर्ण भी था।
  • रवीन्द्रनाथ जी के परिवार के सदस्यों का इस घराने के लोगों के साथ काफी अच्छा सम्बन्ध था । रवीन्द्रनाथ के पिता महर्षि देवेन्द्रनाथ टैगोर ( 1817-1905 ) संगीत कला के संरक्षक थे , जिन्होंने भारत के सभी भागों से बड़े – बड़े कलाकारों को संगीत की शिक्षा दी , इनमें विष्णु चक्रवर्ती ध्रुपद गायक , जदु भट्ट , सुरेन्द्रनाथ बन्द्योपाध्याय , जगतचन्द्र गोस्वामी ( पखावज ) , राम प्रसाद मिश्र ( सितार ) , राधिका प्रसाद गोस्वामी और श्याम सुन्दर मिश्र ( इसराज ) के नाम उल्लेखनीय हैं ।
  • विष्णुपुर घराने में ध्रुपद के चार भाग थे और रवीन्द्र संगीत के गीत भी चार भागों स्थायी , अन्तरा , संचारी तथा आभोग में बँटे हैं । इसी तरह विष्णुपुर घराने में जिस प्रकार ताल के विभाग माने जाते थे , वहीं रवीन्द्रनाथ ने अपने रवीन्द्र संगीत में अपनाए । द्विजेन्द्र नाथ बाँसुरी वादक थे और स्वर विस्तार गवेष्णा करते थे तथा आकारमात्रिक स्वरलिपि के उद्भावक थे ।
  • ज्योतिरिन्द्र नाथ ने आकार मात्रिक स्वरलिपि के पारिजात रूप का प्रचार किया । राग संगीत में उनका अच्छा ज्ञान था , वे संगीत प्रकाशिका के संस्थापक ( वर्ष 1901 ) और सम्पादक भी थे ।
  • रवीन्द्रनाथ ने विष्णुचन्द्र चक्रवर्ती एवं श्रीकण्ठ सिंह से संगीत की शिक्षा प्राप्त की तथा इसके अतिरिक्त यदुभट्ट का संगीत सुनकर उसे आत्मसात् किया और ज्योतिरीन्द्र से उन्होंने सुर रचना की शिक्षा एवं प्रेरणा पाई । इन्दिरा देवी शास्त्रीय संगीत में पारदर्शी थीं और उस युग में स्वरलिपिकार के रूप में प्रसिद्धि पाई ।
  • प्रतिभा चौधरी शास्त्रीय कण्ठ एवं वाद्य संगीत दोनों में प्रवीण थीं । समाज में संगीत के प्रचार के लिए उन्होंने ‘ संगीत संघ ‘ नामक संगीत विद्यालय की स्थापना ( 10-8-1911 ) की और वर्ष 1913 में इन्दिरा देवी के सहयोग से ” आनन्द संगीत ‘ नामक पत्रिका की स्थापना एवं सम्पादन किया।
  • ● ० डॉ . कल्याणी ने इमदाद हुसैन और उनके पुत्र इनायत हुसैन खाँ से सितार की शिक्षा पाई । रवीन्द्रनाथ के सबसे बड़े भाई द्विजेन्द्रनाथ ( 1840-1926 ) बाँसुरी तथा ऑर्गन के कुशल वादक थे । पाश्चात्य संगीत के अनुयायी होते हुए भी इन्होंने भारतीय संगीत के स्वर विस्तार और रवीन्द्र संगीत स्वरलिपि पद्धति पर काफी कार्य किया।
  • रवीन्द्रनाथ के भाई सत्येन्द्रनाथ ( 1842-1923 ) आई . सी . एस . अफसर होते हुए भी संगीत के कुशल रचयिता थे , जिन्होंने ब्रह्म संगीत और एक राष्ट्रीय गीत ‘ जय भारतेर जय ‘ की रचना की । इनकी पुत्री इन्दिरा देवी ( 1873-1960 ) भारतीय और पाश्चात्य संगीत में निष्प्राण थी , जिन्होंने रवीन्द्र संगीत के लिए बहुत कार्य किया और अपनी चचेरी बहन प्रतिभा देवी ( 1865-1922 ) सुपुत्री हेमेन्द्रनाथ के साथ ‘ आनन्द संगीत ‘ पत्रिका का सम्पादन किया।
  • वर्ष 1911 में उन्होंने ‘ संगीत संघ ‘ नाम से एक संगीत विद्यालय की स्थापना की । रवीन्द्रनाथ की बड़ी बहन सौदामिनी ( 1847-1920 ) की शादी शारदा प्रसाद गाँगुली से हुई थी , जो बहुत अच्छे गायक एवं सितार वादक थे । ज्योतिरिन्द्रनाथ ( 1849-1925 ) भी रवीन्द्रनाथ की तरह बहुत प्रतिभाशाली थे । इन्होंने सितार की शिक्षा प्राप्त की व बंगाली स्वरलिपि पद्धति को विकसित करने में योगदान दिया।
  • रवीन्द्रनाथ के बड़े भाई रवीन्द्रनाथ के चचेरे भाई के पुत्र अवनीन्द्रनाथ ( 1971-1951 ) एक प्रसिद्ध अभिनेता लेखक और इसराज वादक थे , जिन्होंने इसराज की शिक्षा तानसेन घराने के मुहम्मद के शिष्य कनाईलाल टेनगारी से प्राप्त की थी ।
  • बाँसुरी वादक सोमेन्द्रनाथ टैगोर ने ‘ रवीन्द्रनाथ रे गान ‘ पुस्तक लिखी , जिसका बहुत सत्कार हुआ ।
  • टैगोर घराने से सम्बन्धित उल्लेखनीय शिष्य कलाकारों के नाम इस प्रकार हैं – गदाधर चक्रवर्ती , रामशंकर भट्टाचार्य , अनन्तलाल बन्द्योपाध्याय , क्षेत्रमोहन गोस्वामी , रामप्रसन्न बन्द्योपाध्याय , गोपेश्वर बन्धोपाध्याय , काशी प्रशान्त बन्द्योपाध्याय आदि हैं ।

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