भारतीय शास्त्रीय संगीत सम्मलेन / समारोह ( विस्तृत जानकारी )

भारतीय शास्त्रीय संगीत सम्मलेन – संगीत एक कला है, जिसे प्रोत्साहन देने के लिए सरकार द्वारा अनेक प्रयास किए गए हैं । संगीत कला की विरासत को प्रोत्साहित करने के लिए सरकार या गैर – सरकारी संस्थानों द्वारा संगीत सम्मेलनों का आयोजन किया जाता है ।

जी हाँ ये सम्मलेन तथा समारोह कई प्रतिष्ठित संगीतज्ञों , घराना तथा अन्य संगीत के पहलुओं को लेकर इनका नामकरण किया गया । आइये जानते हैं भारतीय शास्त्रीय संगीत सम्मलेन / समारोह के बारे में ।

भारत के प्रमुख शास्त्रीय संगीत सम्मेलन / समारोह

संगीत मानवीय अन्तर्भावों की लय एवं तालबद्ध की अभिव्यक्ति है । भारतीय संगीत अपनी मधुरता, लयबद्धता तथा विविधता के लिए विश्वविख्यात है । वर्तमान भारतीय संगीत का जो रूप दृष्टिगत होता है, वह आधुनिक युग की प्रस्तुति नहीं है, बल्कि वह भारतीय इतिहास के प्रारम्भ के साथ ही जुड़ा हुआ सांस्कृतिक पक्ष है । वर्तमान समय में कला के विविध रूपों को प्रोत्साहन देने के लिए सरकार द्वारा अनेक प्रयास किए गए , जिससे भारतीय संस्कृति की विरासत जन – सामान्य तक पहुँच सके ।

संगीत एवं ललित कलाओं की उन्नति के लिए भारत सरकार नीतिगत, संस्थागत तथा योजनागत तरीकों के माध्यम से तथा साथ ही साथ, गैर – सरकारी संस्थाएँ, कला एवं संस्कृति के क्षेत्र में कुछ विशिष्ट व्यक्तियों के द्वारा उनकी सेवाओं के लिए उन्हें समय – समय पर पुरस्कृत किया जाता है । हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत को बढ़ावा देने के लिए संगीत सम्मेलनों का महत्त्वपूर्ण योगदान है । इन भारतीय शास्त्रीय संगीत सम्मलेन ने अपनी जगह और भी अधिक सुदृढ़ कर ली है । कलाकारों ने भी सम्मेलनों को मान्यता देकर और इसमें भाग लेकर शास्त्रीय संगीत के प्रचार में तथा उसके स्तर को ऊपर उठाने में सफल भूमिका निभाई है ।

कुछ भारतीय शास्त्रीय संगीत सम्मलेन निम्नलिखित हैं –

स्वामी हरिदास संगीत सम्मेलन

  • स्वामी हरिदास ( 1480-1575 ) का भारतीय संगीत के इतिहास में अद्वितीय स्थान है । ये प्रसिद्ध गायक तानसेन के गुरु थे । स्वामी जी वृंदावन में निम्बार्क सखी सम्प्रदाय के संस्थापक थे और सम्राट अकबर के समय के सिद्ध भक्त और संगीत – कोविद ( श्रेष्ठ ) माने जाते थे । भारत सरकार ने इनके सम्मान में वर्ष 1954 से स्वामी हरिदास सम्मेलन सुरसिंगार संसद बम्बई द्वारा आयोजित कराया जाता है ।
  • इस सम्मेलन में देश – विदेश के प्रतिष्ठित कलाकारों के साथ – साथ नई प्रतिभाओं को भी अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर दिया जाता है । इस प्रकार से इस सम्मेलन के द्वारा पाँच सौ वर्ष पूर्व की संगीत विधा को जीवित रखा गया है , साथ ही इसमें नवीन तत्त्वों को जोड़ने से संगीत को नवीन पहचान भी दी जा रही है । यह सम्मेलन हरिदास की जयन्ती को मनाने के उपलक्ष में आयोजित होता है ।

तानसेन संगीत समारोह

  • तानसेन ( 1506-1571 ) की संगीतिक विरासत को जीवित रखने के लिए प्रत्येक वर्ष दिसम्बर माह के प्रथम सप्ताह में मध्य प्रदेश सरकार के सांस्कृतिक विभाग द्वारा ग्वालियर में तानसेन सम्मेलन आयोजित किया जाता है । तानसेन स्वामी हरिदास तथा मुहम्मद गौस के शिष्य थे ।
  • अपने गुरुओं से शिक्षा ग्रहण के उपरान्त इनकी गायन विधा से प्रभावित होकर समकालीन शासकों ( रीवा नरेश तथा अकबर ) ने इन्हें अपना दरबारी गायक नियुक्त किया । तानसेन की उच्चकोटि की विधा को नमन करते हुए प्रत्येक वर्ष उच्चकोटि के संगीतज्ञ इस सम्मेलन में भाग लेते हैं और सहर्ष अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं ।
  • इस सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य संगीतकारों द्वारा संगीत के महान् पुरोधा को श्रद्धांजलि अर्पित करना है । शास्त्रीय संगीत परम्परा में हाशिए पर चल रही ध्रुपद गायन शैली को उजागर करने में इस सम्मेलन का विशेष योगदान रहा है । उल्लेखनीय है कि तानसेन प्रचलित ध्रुपद गायन शैली के युगपुरुष माने जाते हैं , इसलिए वर्तमान सन्दर्भ में इनकी विधा को जीवित रखने के लिए उक्त सम्मेलन व समारोह आयोजित किए जाते हैं ।

उस्ताद अलाउद्दीन खाँ जन्म शताब्दी समारोह

  • मैटर बैण्ड के निर्माता तथा सुप्रसिद्ध सरोद वादक उस्ताद अलाउद्दीन खाँ की जन्म शताब्दी ( 1862-1872 ) पर समारोह का आयोजन किया जाता है । अलाउद्दीन खाँ के जन्म शताब्दी समारोह का प्रथम आयोजन वर्ष 1962 में मैहर में किया गया था तब से प्रत्येक वर्ष सरोद वादन की विधा को अक्षुण्ण रखने के लिए वाराणसी में म्यूजिकल सर्किल द्वारा इस सम्मेलन का आयोजन किया जाता है ।
  • उस्ताद अलाउद्दीन खाँ की सरोद वादन की शिक्षा आलाप और ध्रुपद पर आधारित होते हुए भी उनकी अपनी एक विशिष्ट पद्धति थी , जिसे आज ‘ सोनिया मैहर ‘ अथवा ‘ मैहर शैली ‘ घराना कहा जाता है ।
  • उस्ताद अलाउद्दीन को सरोद वादन में उनके योगदान के चलते भारत गौरव , आफताब – ए – हिन्दू , संगीताचार्य तथा वर्ष 1958 में भारत सरकार की ओर से पद्मभूषण से सम्मानित किया गया । इस तरह से उनके योगदान के चलते , उनके नाम से शताब्दी समारोह का आयोजन किया जाता है ।

तानसेन- त्यागराज संगीत समारोह

  • कर्नाटक संगीत के महान संगीतज्ञ त्यागराज ( 1767 – 1867 ) ने अपनी विद्या से समाज , साहित्य के साथ – साथ कला की विविधता को समृद्ध किया ।
  • दूसरी ओर हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के महान् विद्वान् तानसेन ने ध्रुपद की विधा को जनमानस तक प्रचारित किया । संगीत के इन दो महान् प्ररणादायको को एक साथ जोड़ते हुए , उत्तर – दक्षिण ऑर्गनाइजेशन द्वारा तानसेन त्यागराज संगीत समारोह का आयोजन किया जाता है । यह समारोह लखनऊ रवीन्द्रालय भवन में आयोजित किया जाता है ।

भातखण्डे स्मृति समारोह

  • पण्डित विष्णुनारायण भातखण्डे ( 1860-1936 ) हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के प्रमुख विद्वान् थे । इन्हें आधुनिक भारत में शास्त्रीय संगीत के पुनर्जागरण के अग्रदूत के रूप में जाना जाता है । भातखण्डे ने संगीत को बढ़ावा देने के लिए । संगीत की कई संस्थाओं की स्थापना की ।
  • इन्होंने संगीत पर प्रथम आधुनिक टीका लिखी साथ – ही – साथ इन्होंने ” हिन्दुस्तानी संगीत पद्धति ‘ नामक पुस्तक को चार खण्डों में प्रकाशित किया । इन्दिरा कला संगीत विश्वविद्यालय , खैरागढ़ द्वारा पं. भातखण्डे जी की स्मृति में संगीत सम्मेलन का आयोजन किया गया ।

हरिवल्लभ संगीत सम्मेलन

  • बाबा हरिवल्लभ का जन्म 18 वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में होशियारपुर में हुआ । प्रथम बार सम्मेलन 1875 ई . में किया गया । हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के प्रसिद्ध गायक सन्त थे । इनकी स्मृति में पंजाब के जालन्धर में त्रिदिवसीय कार्यक्रम आयोजित किया जाता है । यह कार्यक्रम सन्त श्री हरिवल्लभ जी द्वारा अपने गुरु स्वामी तुलाणी गिरि की स्मृति में आयोजित किया गया था ।
  • वर्तमान में इसी समारोह ने बाबा हरिवल्लभ संगीत सम्मेलन का रूप ग्रहण कर लिया है । यह सम्मेलन प्रतिवर्ष दिसम्बर में देवी तालाब पर आयोजित किया जाता है ।

विष्णुदिगम्बर जयन्ती संगीत समारोह

  • पण्डित विष्णुदिगम्बर पलुस्कर ( 1872-1931 ) ने 19 वीं सदी में संगीत का समाज में शिक्षा के माध्यम से व्यापक स्तर पर प्रचार – प्रसार किया । संगीत की सामूहिक शिक्षा दिलवाने के उद्देश्य से वर्ष 1901 में लाहौर में सर्वप्रथम गन्धर्व महाविद्यालय की स्थापना की गई ।
  • वर्ष 1908 को मुम्बई में गन्धर्व महाविद्यालय की शाखा खोली गई । वर्ष 1909 में संगीतामृत नामक संगीत पत्रिका का सम्पादन किया । उनके इस योगदान के आयोजन किया जाता है । चलते उनकी जन्म स्मृति में प्रत्येक वर्ष अगस्त महीने में संगीत समारोह का

आचार्य बृहस्पति संगीत सम्मेलन

  • आचार्य बृहस्पति ( 1918-1960 ) एक संगीतज्ञ , शास्त्रकार , गायक , चिन्तक , शिक्षक , सलाहकार आदि अनेक रूपों में हमारे बीच में सदैव विराजमान रहेंगे ।
  • आचार्य जी के संगीत में योगदान के चलते सुरसिंगार संसद मुम्बई एवं लखनऊ द्वारा लगभग पिछले 20 वर्षों से सरसिंगार सम्मेलन का आयोजन किया जा रहा है । आचार्य जी की स्मृति को अविस्मरणीय बनाए रखने के लिए वार्षिक सुरसिंगार सम्मेलन का नाम वर्ष 1979 में आचार्य बृहस्पति सम्मेलन रखने का निश्चय किया गया ।

राजा भैया पुँछवाले स्मृति समारोह

  • राजा भैया पुंछवाले ( 1882-1956 ) पुंछ घराने ( ग्वालियर ) के एक भारतीय संगीतकार थे । राजा भैया ने संगीत विधा में अपनी प्रवीणता के कारण शीघ्र ही तान मलिका , संगीतोपासना , ठुमरी और तरंगिनी , ध्रुपद तथा घमार गायन के लिए प्रसिद्धि प्राप्त कर ली ।
  • उन्हें वर्ष 1956 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार दिया गया । उनके इस योगदान के चलते उनकी स्मृति में प्रत्येक वर्ष ग्वालियर के माधव संगीत महाविद्यालय में एक संगीत सभा का आयोजन किया जाता है ।

श्री चन्दन जी चतुर्वेदी शताब्दी समारोह

  • मथुरा म ब्रज विधा के प्रख्यात गायक स्व. चतुर्वेदी के जन्म शताब्दी समारोह के अवसर पर ब्रज कला केन्द्र की शाखा के द्वारा एक त्रिदिवसीय संगीत सम्मेलन का आयोजन किया जाता है ।
  • इस सम्मेलन में उनकी स्मृति में ध्रुपद – धमार , संगोष्ठी , ब्रज भक्ति गोष्ठी श्रद्धांजलि समारोह , ब्रजलोक संगीत सम्मेलन आदि के भव्य कार्यक्रम प्रस्तुत किए जाते हैं ।

कुम्भा संगीत समारोह

  • महाराणा कुम्भा ( 1433 से 1468 ) मेवाड़ के राजा थे । उनका शासनकाल राजनैतिक उपलब्धियों के साथ – साथ सांस्कृतिक उपलब्धियों से परिपूर्ण था । तात्कालिक स्रोतों से ज्ञात होता है कि वे बहुत बड़े विधानुरागी थे । उन्होंने संगीत के अनेक ग्रन्थों की रचना और चण्डीशतक एवं गीतगोविन्द आदि ग्रन्थों की व्याख्या की ।
  • वे नाट्यशास्त्र के ज्ञाता और वीणावादन में भी कुशल थे । उनके सांस्कृतिक योगदान के चलते कुम्भा संगीत परिषद् तथा सुरसिंगार संसद मुम्बई के द्वारा तीस वर्षों से प्रति वर्ष समारोह आयोजित किया जाता है ।

कुदऊ सिंह संगीत समारोह

  • प्रसिद्ध पखावज वादक कुदऊ सिंह का जन्म बाँदा ( उत्तर प्रदेश ) में ( 1815-1910 ) को हुआ था । वे पखावज विधा में प्रसिद्धि के कारण कई रियासतों तथा घरानों से सम्बन्धित थे । उन्होंने झाँसी में रानी लक्ष्मीबाई के दरवारी संगीतज्ञ के रूप में कार्य किया ।
  • रीवा नरेश के कठिन परन संगीत विधा को पखावज से सफलतापूर्वक बजाने के उपरान्त उन्हें सवा लाख का पुरस्कार दिया गया । इस कारण से उस संगीत विधा ( परन ) को सवालाखी परन ( विधा ) कहा गया । उनके संगीत में योगदान के चलते प्रतिवर्ष दतिया में यह समारोह बड़े धूमधाम से मनाया जाता है ।

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दुर्लभ वाद्य विनोद समारोह

  • भारतीय संगीत की शास्त्रीय और लोक परम्पराओं में ऐसे अनेक वाद्ययन्त्र हैं , जिनकी क्षमता और सृजनात्मक सम्भावनाएं अपार है , लेकिन साधना कठिन होने के कारण उनका प्रचलन अधिक नहीं हो सका है ।
  • उस्ताद अलाउद्दीन खाँ संगीत अकादमी द्वारा ऐसे दुर्लभ वाद्यों के साधकों का आदर करने , उन्हें समर्थन देने और दुर्लभ वाद्य तथा शैली को संरक्षण देने के लिए प्रतिवर्ष भोपाल में दुर्लभ वाद्य – विनोद समारोह का आयोजन किया जाता है । इस अकादमी की स्थापना वर्ष 1979 में की गई थी ।

ध्रुपद समारोह

  • ध्रुपद हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत की प्राचीनतम विधा है । यह विधा स्वर एवं रागों के नियमों की शुद्धता पर सर्वाधिक बल देती है । स्वामी हरिदास को इस विधा का जनक माना जाता है । कालान्तर में इस शैली के अन्तर्गत ख्याल , ठुमरी , टप्पा , तराना इत्यादि शैलियाँ विकसित हुईं ।
  • ध्रुपद गायकी के सर्वांगीण पुनर्जागरण के उद्देश्य से वर्ष 1955 से वाराणसी में ध्रुपद समारोह आयोजित किया जाता है । वर्ष 1981 में मध्य प्रदेश सरकार ने इस विधा का प्रचार – प्रसार करने के लिए ध्रुपद समारोह की स्थापना भोपाल में की है ।

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