Time Signature ( ताल ) के प्रकार, लयकारी, विशेषतायें in Western music

Time Signature का अर्थ क्या है ?

Time Signature का Meaning – Western Music में Time Signature का मतलब हिंदी में होता है ” ताल ” । पाश्चात्य स्वरलिपि पद्धति(western Notation System) में ताल भिन्न (fraction) के रूप में पाया जाता है , जैसे – 3/2 , 3/4 , 4/2 आदि जिसे टाइम सिगनेचर (Time Signature ) कहते हैं । इसे सप्तक चिन्ह ( Clef Signature ) के बगल में लिखते हैं ।

भिन्न के ऊपर की संख्या से विभाग के बीट्स ( Beats ) की संख्या व नीचे की संख्या से बीट्स की मात्रायें ज्ञात होती हैं । इसे मालूम करने के लिये सेमी ब्रीव अर्थात् 4 की संख्या में भिन्न के नीचे की संख्या से भाग देते हैं , जैसे – 2/4 से यह ज्ञात होता है कि हर विभाग में दो – दो बीट्स हैं और ताल में ( सेमी ब्रीव अर्थात 4÷4 = 1 ) मात्रा वाले बीट्स की प्रधानता है । इस प्रकार से यह ज्ञात होता है कि प्रत्येक विभाग में 3-3 बीट्स हैं और उस ताल में 4÷2 = 2 मात्रा वाले बीट्स की प्रधानता है ।

ताल के प्रकार ( Time Signature )

ताल के प्रकार ( Time Signature ) – पाश्चात्य तालों के मुख्य दो प्रकार हैं –

1- सिंपल टाइम ( Simple Time ) और 2- कम्पाउण्ड टाइम ( Compound Time )

सिंपल टाइम में प्रत्येक मात्रा बिंदु रहित और कम्पाउंड टाइम में प्रत्येक मात्रा बिन्दु युक्त होता है । किसी मात्रा चिन्ह की दाईं ओर एक बिंदु रख देने से उसकी मात्रा डेढ़ गुनी हो जाती है ।

सिंपल टाइम की प्रत्येक मात्रा ( Beat ) को दो , चार अथवा आठ भागों में विभक्त किया जा सकता है और कम्पाउण्ड टाइम की प्रत्येक मात्रा ( Beat ) को तीन , छ :, नौ , बारह , पन्द्रह आदि विभागों में विभक्त किया जा सकता है ।

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Time Signature
Time Signature in western Music

उपर्युक्त दोनों टाइम सिगनेचर (Time Signature) के तीन – तीन उप विभाग हैं –

  1. Duple Time ( डयूपिल टाइम ) के प्रत्येक विभाग में दो – दो मात्रायें ( Beats ) होती हैं ।
  2. Triple Time ( ट्रिपिल टाइम ) के प्रत्येक विभाग में तीन – तीन मात्रायें ( Beats ) होती हैं ।
  3. Quardruple Time ( क्वाड्रपिल टाइम ) के प्रत्येक विभाग में 4-4 मात्रायें ( Beats ) होती हैं । 

स्टाफ नोटेशन में कठिन लयकारियाँ

लयकारी का मतलब क्या है ? <Click

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स्टाफ नोटेशन में कठिन लयकारियाँ यहाँ पर कुछ कठिन लयकारियों के उदाहरण स्टाफ नोटेशन सिस्टम में दिये जा रहे हैं –

Duplet – जब तीन मात्रा में 2 स्वर गाये – बजाये जाते हैं तो उसे डुप्लेट कहते हैं । इसे दिखाने के लिये दोनों स्वरों के ऊपर अर्ध चंद्राकार का चिन्ह लगाकर उसके नीचे 2 लिख देते हैं ।

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Triplet- जब दो मात्रा में तीन स्वर गाये – बजाये जाते हैं तो उसे ट्रिप्लेट कहते हैं । इस लयकारी को लिखने के लिये तीनों स्वर ( 318 ) के ऊपर एक चन्द्राकार और उसके नीचे 3 की संख्या लिख देते हैं ।

Quardruplet- जब 3 मात्रा में 4 की लयकारी होती है तो उसे क्वाड्रप्लेट कहते हैं और चारो स्वरों पर अर्ध चन्द्रकार का चिन्ह लगा कर उसके नीचे ऊपर की तरह 4 लिख देते हैं ।

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Quintuplet- इसमें 5 स्वरों का समूह होता है जिसे 4 मात्रा के काल में गाने – बजाने से क्विन्टुप्लेट कहते हैं । इसे भी लिखने के लिये पांचों स्वर के ऊपर अर्ध चन्द्राकार और उसके नीचे 5 की संख्या लिखेंगे ।

Sextolet- इसमें 6 स्वरों का समूह होता है जिसे 4 बीट्स के समय में गाया – बजाया जाता है । इसका चिन्ह चंद्राकार के नीचे 6 की संख्या होती है ।

Septolet- इसमें 7 स्वरों का समूह होता है जिसका चिन्ह चंद्राकार के नीचे 7 की संख्या होती है ।

इन लयकारियों को ठीक प्रकार से समझने के लिये, पाश्चात्य संगीत की इन विशेषताओं को अवश्य ध्यान में रखना चाहिए कि –

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1. पाश्चात्य संगीत में केवल 3 प्रकार के विभाग होते हैं – 2 , 3 अथवा 4 बीट्स वाले ।

2. क्लेफ की दाहिनी ओर लिखे गये टाइम सिगनेचर से जैसे – 2/2 , 2/4 या 2/8 से , विभाग के बीट्स की संख्या का बोध होता है ।

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3. पश्चिमी संगीत में केवल एक विभाग में भी लयकारी दिखाई जा सकती है ।

4. मात्रा की दृष्टि से एक टाइम सिगनेचर में प्रत्येक विभाग का समान होना आवश्यक है ।

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इन कारणों से ड्यूपिल के विभाग में लयकारी लिखने का अर्थ यही होगा कि 2 में 3 या 2 में 5 इत्यादि । इसी तरह ट्रिपिल विभाग में 3 बीट्स होंगे और लयकारी तीन मात्रा में ही दिखाई जाएगी । इसलिये तीन मात्रा में 4 , 5 या 7 स्वर गाये – बजाये जायेंगे । इसलिये जब 3 बीट्स को ड्यूपिल विभाग में लिखेंगे तो 3/2 की लयकारी और जब क्वाड्रपिल विभाग में लिखेंगे तो 3/4 की लयकारी होगी । 

पाश्चात्य ताल – पद्धति (Taal Paddhati) की विशेषतायें

पाश्चात्य ताल पद्धति की निम्न विशेषतायें हैं –

1. पाश्चात्य तालों में किसी प्रकार का ठेका अथवा बोल नहीं होता जैसा कि उत्तर भारतीय तालों में होता है । इसलिए भारतीय ताल उन लोगों के लिये विशेष कौतूहल और आश्चर्य की चीज होती है ।

2. किसी भी पाश्चात्य ताल में मात्राओं की संख्या निश्चित नहीं होती , किंतु विभाग की मात्रायें निश्चित होती हैं । किसी रचना में प्रत्येक विभाग उस समय तक समान मात्राओं का होता है , जब तक पुनः ताल ( टाइम सिगनेचर ) परिवर्तित नहीं होता ।

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3. स्टाफ स्वरलिपि(Staff Notation) में टाइम सिगनेचर(Time Signature) द्वारा ताल दिखाया जाता है । इसलिये प्रत्येक रचना में क्लेफ सिगनेचर की दाहिनी ओर भिन्न(fraction) में संकेत लिखा रहता है जैसे – 2/2 , 2/4 , 2/8 आदि ।

4. किसी भी ताल के विभागों में मात्राओं का सम होना अनिवार्य है । इसलिए केवल एक ही विभाग ( Bar ) को देखने से यह मालूम हो जाता है कि कोई ख़ास (अमुक) गीत के विभाग में कितनी मात्रायें हैं । उदाहरणार्थ – अगर किसी रचना के प्रथम विभाग में 4 मात्रायें हैं तो उसके सभी विभागों में 4-4 मात्रायें होंगी ।

5. पाश्चात्य किसी भी रचना से ‘ टाइम ‘ किसी भी प्रकार से पृथक् नहीं किया जा सकता । इसका मुख्य कारण यह है कि पाश्चात्य तालों का विकास गीत – रचना के साथ – साथ गीत के अनुसार हुआ है । इसके विपरीत हम भारतीय संगीत में देखते हैं कि कोई भी ताल गीत से बिल्कुल पृथक् किया जा सकता है , क्योंकि भारतीय तालों का विकास स्वतंत्र रूप में हुआ है ।

6. जिस प्रकार हिंदुस्तानी संगीत में तीन ताल का अधिक प्रचार है , उसी प्रकार पाश्चात्य संगीत में 4/4 टाइम सिगनेचर का । अगर किसी रचना में टाइम सिगनेचर न दिया जाय तो अपने आप ही 4/4 मान लिया जाता है । इसे कामन टाइम (Common Time) कहते हैं । 

Western Notation System in Hindi पाश्चात्य स्वरलिपि पद्धति

सप्त स्वर ज्ञान” से जुड़ने के लिए आपका दिल से धन्यवाद ।

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2 thoughts on “Time Signature ( ताल ) के प्रकार, लयकारी, विशेषतायें in Western music”

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