स्वर , लय, ताल और रस का सम्बन्ध – Taal and Ras Siddhant

स्वर , लय और ताल से रस का सम्बन्ध

स्वर , लय और ताल से रस का सम्बन्ध – शब्द , लय , स्वर और ताल मिलकर संगीत में रस की उत्पत्ति करते हैं । साहित्य में छन्द की विविधता एवं संगीत में ताल और लय के सामंजस्य द्वारा ही विभिन्न रसों की सृष्टि की जा सकती है । ताल से अनुशासित होकर ही संगीत विभिन्न भाव और रसों को उत्पन्न करता है । तालविहीन संगीत को नासिकाविहीन मुख की तरह बताया गया है । ताल की गतियाँ स्वरों की सहायता के बिना भी रस की सृष्टि में सक्षम होती हैं । साहित्य में नौ रसों का उल्लेख किया गया है – शृंगार , वीर , हास्य , वीभत्स , करुण , भयानक , रौद्र , अद्भुत एवं शान्त

नाट्य में शान्त रस को अलग न मानते हुए आठ रसों का प्रतिपादन किया गया है । संगीत में शृंगार , वीर , करुण और शान्त इन चार रसों में अन्य समस्त रसों का समावेश माना गया है तथा ताल और लय को भी रसों से सम्बन्धित माना गया है , जैसे –

” लया हास्यशृंगारयोर्मध्यमाः । वीभत्स भयानकयोविलम्बितः ।। वीररोद्रादसुतेषु च दुत । ”

अर्थात् मध्यलय – हास्य एवं शृंगार रसों की पोषक है । विलम्बित लय – वीभत्स और भयानक रसों की पोषक है । द्रुतलय – वीर , रौद्र एवं अद्भुत रसों की पोषक है ।

किसी भी कला के लिए यह अतिआवश्यक है कि उससे मानव – हृदय में स्थित स्थायी भाव जगे और उन भावों से तत्सम्बन्धित रस की उत्पत्ति होती हो , तभी मनुष्य आनन्द स्वरूप सुख की अनुभूति कर सकता है , इसे ही सौन्दर्य – बोध कहा जाता है ।

महर्षि भरत अनुसार , नाट्यशास्त्र ‘ के वाद्याध्याय में भी कहा गया है कि ऐसा कोई वाद्य नहीं है , जिसका उपयोग नाट्य में न हो पाए । अत : किसी भी वाद्य का विधिवत् प्रयोग विचारपूर्वक रस तथा भावों को देखते हुए करना चाहिए । “

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‘ नाट्यशास्त्र ‘ में किसी रूपक के विभिन्न पात्रों और उनकी विविध अवस्थाओं में प्रयोग किए जाने वाले तालवाद्यों द्वारा अनुकूल रस की सृष्टि के लिए कुछ निर्देश निम्न प्रकार से दिए गए हैं ।

रस की सृष्टि के लिए निर्देश

• पात्रों की शीघ्रता से चलने की दशा में वाद्य – वादन में ‘ वं वं घे घे टां ‘ रखा जाए और इसे अंगुलियों के विषम प्रहारों से प्रस्तुत किया जाता है अथवा निकाला जाता है , जिसे अंगुलियों के द्वारा वादन में की जाने वाली गति प्रकरण में बताया गया है । जिस प्रकार व्यंजनों से शब्द और शब्दों द्वारा वाक्य रचित होते हैं और वान्यों का अर्थ ही मुख्य रूप से रसोद्रेक में कारण होता है , ठीक उसी प्रकार पाटाक्षरों के संयोग से तालवाद्यों के बोल बनते हैं और बोलों से ही विभिन्न गतियों या चालों का स्वरूप निर्मित होकर एक निश्चित रस का भाव उत्पन्न होता है ।

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• उत्कृष्ट तबला – वादक इन चालों के सम्यक् प्रयोग से गीत के विश्राम काल और उत्थान काल में ऐसा सौन्दर्य भर देते हैं कि गीत और उसके अनुवर्ती अन्य वाद्यों को समुचित भाव और रस उत्पन्न करने में सहायक होते हैं ।

ऐसा होने पर ही श्रोताओं के मुख से वाह और हृदय से आह निकलती है । यदि पाटाक्षर अधिक जटिल और परिष्कृत रूप से तबला – वादन में चमत्कार की सृष्टि होने लगती है । श्रोता आनन्द सागर में डूबते हुए स्तब्ध रह जाते हैं ।

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9 रस और ताल – तालिका

कुछ प्रचलित तालों को नीचे दी गई तालिका के अनुसार नौ रसों में विभक्त किया गया है –

ताललय
शृंगारतीन , सात और आठ मात्रा वाली तालें ; जैसे – दादरा , रूपक , कहरवा , दीपचन्दी , धुमाली आदिमन्द , ललित और कोमल गति स्वच्छन्द भाव ।
करुणसात मात्रा वाली तालें ; जैसे – रूपक आदिविलम्बित लय प्रधान शिथिल गति युक्त ।
वीरदस , बारह और चौदह मात्रा वाली तालें जैसे – रुद्र ताल , मत ताल , सूल , चौताल और आड़ा चौताल आदि ।गौरव गति से युक्त आवेगपूर्ण द्रुत लय ।
भयानकबारह और चौदह मात्रा वाली तालें जैसे – धमार , चौताल आदि ।भयत्रासित गति – युक्त मध्य लय ।
हास्यचार व पाँच मात्रा वाली तालें जैसे – चक्रताल और द्रुत कहरवा आदि ।विषम और विक्षिप्त गति
रौद्रबारह और चौदह मात्रा वाली तालें ; जैसे – चौताल , धमार आदि ।अतिद्रुत लययुक्त प्रचण्ड गति ।
वीभत्सअनियमित मात्राओं वाला कोई भी सम – विषम ताल – स्वरूपसंकोच गतियुक्त अतिमन्दित
अद्भुतग्यारह , पन्द्रह और सोलह मात्रा वाली तालें ; जैसे – गजझम्पा , कुम्म , तीनताल आदि ।आश्चर्य गति प्रधान लड़खड़ाती लय ।
शांतबारह और चौदह मात्रा वाली तालें , जैसे – एकताल और झूमरा आदि ।स्थिर या अचंचल गति ।
तालों का रसों में विभाजन

पूर्वांकित तालिका एक सुझाव ही है । तबले के बोलों का वचन ताल की गति , खाली – भरी के स्थान परिवर्तन , दाएँ व बाएँ के परिवर्तित रूप , अवग्रह , पात – निपात प्रक्रिया , वादक की अंगुलियों के समुचित स्पर्श और तात्कालिक सूझबूझ से किसी भी ताल को इच्छित प्रभाव उत्पन्न करने के लिए इच्छित रस से अनुकूल बनाया जा सकता है ।

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हास्य उत्पन्न करने के लिए कभी – कभी तबला – वादक हथौड़ी के स्पर्श द्वारा एक विचित्र – सी ध्वनि उत्पन्न कर देते हैं । इसी प्रकार चमत्कार उत्पन्न करने के लिए अतिद्रुत लयरूप – विधान को भी प्रस्तुत किया जाता है ।

लय और ताल के द्वारा समग्र प्रकृति की व्यवस्था का चित्रण किया जा सकता है । प्राचीनकाल में रंगमंच पर जब कोई नाटक खेला जाता था , तो अकेला तबला – वादक दृश्य और अभिनेता के अभिनय के अनुसार दाएं – बाएँ तबले पर आघातों द्वारा प्रत्येक भाव और रस को अत्यधिक सफलता और सरलता के और आग लगाने का प्रभाव , विदूषक क्रीड़ाएँ , युद्ध का कोलाहल आदि सभी साथ प्रदर्शित कर दिया जाता था । नायक – नायिका की अवस्था , आंधी – तूफान अपितु बोलता था । तबला – वादक की कुशलता से सजीव कर दिए जाते थे । तबला बजता नहीं , अपितु बोलता है ।

छन्द और शब्द रचना से रस का सम्बन्ध

जिस प्रकार विभिन्न रसों की अभिव्यक्ति के लिए स्वर , लय ताल का विशेष सम्बन्ध होता है वैसे ही ( साहित्यिक ) काव्यगत दृष्टि से छन्द और शब्द रचना का रस के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध है ।

मानव अपने सुख – दुःख , शोक , विरह , प्रेम आदि भावों की अनुभूति को कविता , छन्द , अलंकार , साहित्यिक शब्द रचना आदि के माध्यम से भी अभिव्यक्त करता है ; जैसे – युद्ध के समय सेना / सिपाहियों को जोश दिलाने के लिए ‘ झाँसी की रानी ‘ कविता “

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बुन्देले हर बोलो के मुँह , हमने सुनी कहानी थी ।

खूब लड़ी मर्दानी वो तो , झाँसी वाली रानी थी । ”

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की पंक्तियाँ सुनाकर देश के प्रति मर मिटने की भावना जागृत की जाती है , ऐसी पंक्तियाँ ‘ वीर रस ‘ की अनुभूति कराती हैं , इसीलिए कहा जा सकता है कि बिना काव्य ( छन्द और शब्द रचना ) के विभिन्न रसों व उनके भावों की रसानुभूति एवं अभिव्यक्ति असम्भव है । अत : छन्द और शब्द रचना एवं रस एक – दूसरे के पूरक हैं ।

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