लोकनृत्य- भारत के विभिन्न प्रान्तों के लोकनृत्य – Loknritya

लोकनृत्य के इस अध्याय में आप जानेंगे लोकनृय के प्रकार , लोकनृत्य के वर्गीकरण तथा भारत के सभी राज्यों में प्रचलित लोकनृत्य के बारे में विस्तार से ।

विषय - सूची

लोकनृत्य क्या है ?

  • जब साधारणजन अपने गानों की अभिव्यक्ति विभिन्न अंग प्रत्यंगों के माध्यम से विभिन्न मुद्राओं के रूप में गीत स ताल के साथ अपनी काला अभिवत करता है , तो वह नृत्य ही लोकनृत्य कहलाता है । प्रत्येक बोत्र के लोकगीती , लोकवाही की तरह लोकनृत्य भी पौगोलिक , सामाजिक व सांस्कृतिक परिस्थितियों से प्रभावित होते है ।
  • प्रत्येक क्षेत्र का अपना पृथक लोकनृत्य होता है , जो क्षेत्र विशेष की जैसे पंजाब का गॉगला या गिददा नृत्य , ‘ राजस्थान का भूमर नृत्य , गुजरात का गरबा नृत्य , तमिलनाडु का कुमी और मथर नृत्य , अरुणाचल प्रदेश का मुखौटा नृत्य आदि ।
  • भारत के प्रसिद्ध नृत्यकार उदय शंकरजी ने ठीक कहा है , ” प्रत्येक भारतीय नर्तक है । हमारा देश कृषि प्रधान देश है । जहाँ अधिकतर लोग खेती से जुड़े है । इस तरह हमारे देश की जनता का नृत्य इन्हीं के पास है अर्थात लोकनृत्य ही जनता का नृत्य है । ” लोकगीत तथा लोकनृत्यों का उदगम स्थल हमारा प्राम्य जीवन है ।
  • ग्राम्य जीवन की सहज एवं स्वाभाविक अभिव्यक्ति हमारे लोकसंगीत में स्पष्ट झलकती है । लोकजीवन की प्रत्येक दिशा नृत्य से व्याप्त है । प्रकृति भी इससे प्रेरित है । प्रात : काल सूर्य नृत्य करता निकलता है । मयूर , बन्दर , भालू तथा साँप नृत्य करते है । ये सभी प्रकार के नृत्य लोकनृत्यों के अन्तर्गत आते है । लोकनृत्य जीवन की गति से सम्बन्धित हैं । वस्तुतः लोकनृत्य हमारे सांस्कृतिक इतिहास का दर्पण है ।

अतः वे नृत्य जो आम जनता द्वारा किए जाते है तथा जनजीवन की भाषा , पहनावा , धार्मिक विश्वास व परम्पराओं को दर्शाते हैं , यह सरल व सुगम होते हैं , उन्हें लोकनृत्य कहा जाता है ।

लोकनृत्य का वर्गीकरण

लोकनृत्यों का वर्गीकरण लोकनृत्यों को सामान्यतः तीन वर्गों में बांटा जाता है –

  1. सामाजिक तथा सामुदायिक नृत्य ऐसे नृत्य जो सार्वजनिक कार्यों , सामाजिक उत्सवों आदि में सामूहिक रूप से किए जाते है । जैसे – भांगड़ा , गिद्दा , डाण्डिया आदि ।
  2. व्यावसायिक नृत्य इस श्रेणी में वे नृत्य आते है , जो अपनी जीविकोपार्जन हेतु किए जाते है ; जैसे – भवाई , तेरहताली , कालवेलिया , कठपुतली आदि ।
  3. आदिवासी नृत्य सामान्य जनजीवन से दूर जो आदिवासी लोग रहते हैं , वे लोग अपने भावों को विभिन्न मुद्राओं व अंग प्रत्यंगों के माध्यम से अभिव्यक्त करते हैं , उसे आदिवासी नृत्य कहा जाता है ; जैसे – भील नृत्य , संथाल आदि ।

लोकनृत्य के प्रकार

लोकनृत्य के प्रकार – लोकनृत्य छोटे स्तरों पर चार प्रकार के होते हैं –

  • क्षेत्र आधारित लोकनृत्य इसमें क्षेत्र विशेष से सम्बन्धित नृत्य शामिल होते हैं अर्थात् कुछ ऐसे नृत्य होते हैं , जो कुछ क्षेत्र में ही पाए जाते हैं । इसका प्रकार दूसरे क्षेत्र में कम पाया जाता है ; जैसे – असम का बिहू , गुजरात का गरबा आदि ।
  • जाति आधारित लोकनृत्य लोकनृत्यों में जाति विशेष के लोगों द्वारा किए जाने वाले नृत्य जाति आधारित लोकनृत्य कहलाते हैं ; जैसे – आन्ध्र प्रदेश में लबाड़ी जनजाति द्वारा किया जाने वाला नृत्य ।
  • व्यावसायिक लोकनृत्य जिस लोकनृत्य का प्रदर्शन जीविकोपार्जन का साधन बन गया , वे नृत्य व्यावसायिक नृत्य कहलाते हैं ; जैसे – राजस्थान का भवाई नृत्य , तेरहताली नृत्य ।
  • पर्व व धर्म सम्बन्धी नृत्य जिस लोकनृत्य का प्रदर्शन पर्व या धार्मिक अवसरों पर किया जाता है , उसे पर्व या धार्मिक नृत्य कहा जाता है । जैसे – झारखण्ड का करमा नृत्य

भारत के विभिन्न प्रान्तों के लोकनृत्य

भारत के विभिन्न प्रान्तों के लोकनृत्य भारत के विभिन्न प्रान्तों के लोकनृत्य निम्नलिखित हैं

कश्मीर के लोकनृत्य

  • कश्मीर के लोकनृत्य कश्मीर की स्त्रियों द्वारा ‘ रोफ ‘ या ‘ रोरूफ ‘ किया जाने वाला सरलतम व प्रचलित नृत्य है । यह एक धार्मिक नृत्य है , जिसे ईद व रमजान के दिनों में किया जाता है । इसे फसल कटाई के समय भी किया जाता है ।
  • इस नृत्य को स्त्रियाँ आमने – सामने खड़े होकर एक – दूसरे के गले में बाँहें डालकर या हाथों में हाथ डालकर नाचती – कूदती साथ – साथ कदम बढ़ाती हुई करती हैं । इस नृत्य के साथ किसी वाद्य की संगत नहीं होती है ।

हिमाचल प्रदेश के लोकनृत्य

हिमाचल प्रदेश के लोकनृत्य हिमालय की पहाड़ियों में रहने वाले लोग भी मेले व पर्वो पर संगीत व नृत्य करके अपने जीवन को मधुर बनाते हैं । वहाँ पर प्रचलित प्रमुख नृत्य निम्नलिखित हैं

Advertisement

झांझर नृत्य

झांझर नृत्य वृत्ताकर रूप में पुरुष वर्ग व स्त्री वर्ग पृथक् – पृथक् गोला बनाकर नृत्य करते हैं । इस नृत्य के प्रारम्भ में लय की गति धीमी होती है , फिर लय बढ़ती जाती है और गोले में नाचते हुए ही स्त्री – पुरुष अपना स्थान परिवर्तन करते हैं ।

नामगेन नृत्य

नामगेन नृत्य ये सितम्बर माह में पतझड़ के मौसम में खुले मैदान में किया जाता है । इसमें स्त्रियाँ चाँदी के सुन्दर आभूषण ” पहनकर नृत्य करती हैं । . किभोरी नटी फसलों की कटाई बुआई के समय पहाड़ियों की लावण्यमयी प्रकृति के अनुरूप अंग संचालन करते हुए यह नृत्य किया जाता है ।

Advertisement
Advertisement

डांगी नृत्य

डांगी नृत्य हिमाचल के चम्बा क्षेत्र में रहने वाली स्त्रियाँ , रंग – बिरंगे वस्त्र , आभूषणों से सजकर एक – दूसरे का हाथ पकड़कर गोल घेरे में धीमी लय में नृत्य करती हैं , फिर धीरे – धीरे लय बढ़ाती हैं । इस नृत्य के साथ जो गीत गाया जाता है , उसे ‘ घुरैही ‘ गीत कहा जाता है । इनके अतिरिक्त ‘ खार नृत्य ‘ में चन्द्राकार या अर्द्धचन्द्राकार घेरे में स्त्री – पुरुष नाचते हैं । कुल्लू घाटी में विजयादशमी से लेकर दिवाली तक रामचन्द्र जी के जीवन पर आधारित नृत्य किए जाते हैं , जिसमें ‘ घुघती ‘ नृत्य प्रसिद्ध है । यह नृत्य घुघती पक्षी के नाम से प्रसिद्ध हुआ , जोकि गुटर – गूं – गूं बोलते हुए , दाना चुगते हुए गोल घेरे में नाचता रहता है , इसमें पुरुष वर्ग ही गोल घेरे में नाचते हैं , स्त्रियाँ नहीं नाचतीं ।

केरल के लोकनृत्य

कोल काली नृत्य

कोल काली नृत्य पुरुषों द्वारा किया जाने वाला नृत्य है । इसमें नर्तकों की संख्या बड़े समूह में 40-80 तक होती है । यह नृत्य , नृत्य स्थान पर ऊंचे खम्बे पर दीप जलाकर उसके चारों ओर डण्डे लेकर किया जाता है । इस नृत्य को वर्षा ऋतु के अतिरिक्त सभी अवसरों व ऋतुओं में किया जा सकता है ।

Advertisement

काईकोट्टीवाली नृत्य

काईकोट्टीवाली ओणम् के अवसर पर किया जाने वाला स्त्रियों का प्रमुख नृत्य है । इसमें स्त्रियाँ गोल घेरे में टेबल पर दीप जलाकर ताली बजाते हुए नृत्य करती हैं । दक्षिण केरल में चेहरे पर मुखौटे ( पशु – पक्षी , यक्षी ) पहनकर नृत्य करते हैं , जिसे ‘ पडेनी ‘ नृत्य कहा जाता है ।

गोवा का नृत्य

गोवा के पश्चिमी समुद्र तट के मछुआरों द्वारा किया जाने वाला नृत्य ही गोवा का प्रमुख लोकनृत्य है , जिसे मछुआरा ‘ नृत्य कहा जाता है ।
इस नृत्य में स्त्री व पुरुष जोड़ी बनाकर समुद्र की लहरों , मछली पकड़ने की गतियों , नौका चलाने के प्रकार आदि को विभिन्न अंग संचालन के माध्यम से नृत्य करते हुए प्रदर्शित करते हैं । महाराष्ट्र में इस नृत्य को ‘ कोल्याचा ‘ नृत्य कहा जाता है ।

Advertisement

नागालैण्ड का नृत्य

नागा प्रदेश का प्रसिद्ध नृत्य ‘ तेरी लोप फुकले ‘ है , जिसे विशेषकर चांग जाति द्वारा किया जाता है ।
युद्ध में विजय प्राप्त करने के बाद ढोल , सहित हाथों में भाला लेकर नाचा जाता है ।

तमिलनाडु के लोकनृत्य

पित्रल कोलाट्टम नृत्य

तमिलनाडु के नृत्य • पित्रल कोलाट्टम यह नृत्य तमिलनाडु की अति प्राचीन कला है । इस नृत्य में खम्बे के ऊपर रस्सियाँ बाँधी जाती हैं और इसका दूसरा सिरा स्त्रियों के हाथ में होता है । नृत्य में गोल घूमते हुए रंगीन रस्सियों का एक सुन्दर नमूना बन जाता है और पुनः नृत्य करते हुए इसे खोला जाता है । ये नृत्य दीपावली के बाद प्रथमा से 10 दिन तक किया जाता है । ये नृत्य महाराष्ट्र के ‘ गोफ ‘ नृत्य के समान ही होता है ।

कोलाट्टम नृत्य

कोलाट्टम यह स्त्रियों द्वारा किया जाता है , दोनों हाथों में डण्डे बजाते हुए ताल पर यह नृत्य किया जाता है ।

मायिल अट्टम या मयूरनृत्य नृत्य

मायिल अट्टम या मयूरनृत्य लड़कियों द्वारा मोर का मुखौटा , वेशभूषा और मोर पंख पहनकर गाँवों में होने वाले त्यौहारों में यह नृत्य विशेष रूप से किया जाता है ।

Advertisement

कमण्डी अथवा कामन पण्डीगे नृत्य

कमण्डी अथवा कामन पण्डीगे इस नृत्य में शिव के मदन दहन की । अभिव्यक्ति की जाती है , जिसमें गाँवों के लोग दो भागों ( समूहों ) में विभक्त | होकर पौराणिक कथा को प्रस्तुत करते हैं , जिसमें मुख्य पात्र राति व कामदेव | होते हैं ।

हरियाणा के लोकनृत्य

धमाल नृत्य

धमाल नृत्य यह नृत्य फाल्गुन माह में , खले मैदान में नर्तक द्वारा गोला बनाकर ‘ धमाल ‘ गान शैली पर किया जाता है । इसमें सारंगी , बीन , करताल , ढोलक आदि वाद्यों का प्रयोग करते हुए सभी किसान अपने भावों की अभिव्यक्ति करते हैं । गुड़गाँव ( गुरुग्राम ) का प्राचीन नृत्य है ।

Advertisement

फाग नृत्य

फाग नृत्य फाग के महीने में फसल कटाई से पूर्व ( पहले ) अच्छी फसलों को उपज के विभिन्न भावों व उमंगों को स्त्री – पुरुष समूह रूप में गीतों को गाते हुए | अंग संचालन व पद संचालन को बड़े जोश के साथ करते हुए प्रस्तुत करते हैं ।। इसमें भी धमाल शैली का गायन होता है ।

ढप नृत्य

ढप नृत्य बसन्त ऋतु व धान कटाई के समय पर थाप की लय पर यह नृत्य | किया जाता है ।

Advertisement

मणिपुर का लोकनृत्य

ढोल चोलय नृत्य

ढोल चोलय यह नृत्य मुख्यतः धार्मिक अनुष्ठानों एवं उत्सवों पर पुरुषों द्वारा उछलकर चक्कर काटते हुए व आग के करतब दिखाते हुए मृदंग , ढोल , नगाड़ों की थाप पर किया जाता है ।
• इसमें प्रारम्भ में ढोल की लय धीमी होती है , फिर नृत्य करते – करते गति बढ़ा दी | जाती है ।

बिहार का लोकनृत्य

बिहार का लोकनृत्य • बिहार के छऊ , विदेशिया , जाट – जटिन आदि प्रमुख लोकनृत्य हैं । छऊ नृत्य | सरायकेला का अद्भुत नृत्य है , इसमें हास्य – विनोद एवं अभिनय होता है । ‘ करमा ‘ वर्षा ऋतु और ‘ गीड़ा ‘ होली के अवसर पर किया जाता है ।

करमा नृत्य का नाम करमा वृक्ष के नाम पर पड़ा है । इसके अतिरिक्त झिझिया | नृत्य इन्द्र देव की भक्ति व अच्छी वर्षा की कामना के लिए किया जाता है ।

असम का लोकनृत्य

बिहू नृत्य

असम का लोकनृत्य ‘ बिहू ‘ असम का प्रसिद्ध लोकनृत्य है । यह नृत्य फसल काटने के बाद सामूहिक कहते हैं । रूप में किया जाता है । इस नृत्य के साथ जो गीत गाते हैं , उसे ‘ बिहू गीत | .

Advertisement
Advertisement

• इस नृत्य को ‘ महारास ‘ नृत्य के नाम से भी जाना जाता है । यहाँ पर इसके की विशेष जाति द्वारा बाँसों को जमीन पर शतरंजनुमा ( चौकोर ) बिछाकर दो अतिरिक्त केरी – गोपाल नृत्य देव पूजन के लिए होता है । असम की लुशाई जिले तरफ से बॉस को पास – दूर करते हुए उछलते हुए बीच – बीच में पैर रखकर किया जाता है ।

ओडिशा का लोकनृत्य

ओडिशा का लोकनृत्य • ओडिशा , चौ , घमुरा , कुरंग , चामर , सावरा आदि ओडिशा के प्रसिद्ध लोकनृत्य हैं । इसमें ‘ चौ नृत्य लड़के महिलाओं का वेश रखकर नृत्य करते हैं , नृत्य खुले मैदान में मशाल जलाकर होता है । विभिन्न विषयों ; जैसे – मयूर , कुरा विषयानुसार नकली चेहरे लगाकर व वस्त्र पहनकर ढोल व गानों पर नाचते धीवर , सावश आदि नृत्य भी ओडिशा के भाव प्रधान नृत्य हे , जिनमें कलाकार । हैं ; जैसे – मयूर नृत्य में मोर की प्रसन्नता के भाव और मोर पंख के वस्त्र पहनकर करते हैं ।

घमुरा नृत्य

घमुरा नृत्य इस नृत्य का नाम घड़े के आकार के परम्परागत ढोल के आधार पर पड़ा । इसकी ध्वनि सामान्य ढोल से भिन्न होती है । ये ओडिशा के कालाहाण्डी स्थान पर सितम्बर माह में विशेष रूप से किया जाता है ।

दलकाई नृत्य

दलकाई नृत्य सम्बलपुर ( ओडिशा ) क्षेत्र की विशिष्ट जाति की महिलाओं द्वारा ओजपूर्ण व गतिशील अंग संचालन में यह नृत्य किया जाता है ।

मध्य प्रदेश के लोकनृत्य

सींग नृत्य

मध्य प्रदेश के नृत्य – सींग नृत्य मुरिया जनजाति ‘ के स्त्री – पुरुषों द्वारा मिलकर ‘ सींग ‘ नृत्य किया जाता है । पुरुष सींग से जड़े शिरो वस्त्र , गुच्छेदार पंख के साथ पहनते हैं , चेहरे पर कौड़ी की झालर तथा गले में लकड़ी के लट्ठ जैसा ढोल लटकता है । महिलाओं के सिर पर चौड़ी ठोस पीतल की माला व सीने पर धातु के गहने होते हैं । हाथों में मंजीरे बजाते हुए लगभग 50 से 100 लोग मिलकर इस नृत्य को करते हैं । ।

तेरहताली नृत्य

तेरहताली नृत्य राजस्थान के तेरहताली नृत्य की तरह ही मध्य प्रदेश में तेरहताली नृत्य किया जाता है ।

Advertisement
Advertisement

भवाई नृत्य

भवाई नृत्य दीपावली भारत का मुख्य त्यौहार है । दीपावली के अवसर पर महिलाएँ व पुरुषों के नृत्यों की धूम मच जाती है , जिसको दीपावली नृत्य भी कहते हैं । यह नृत्य बुन्देलखण्ड में विशेष प्रचलित है । पुरुष समूह में अपने शौर्य और पराक्रम का प्रदर्शन करते हैं । इस नृत्य से कृषक जीवन का भी निकट सम्बन्ध है , क्योंकि इस समय फसलें तैयार होकर कटती हैं और इस खुशी में कृषक लोग उल्लास में मग्न होकर नृत्य करते हैं । यह शौर्य पराक्रम से पूर्ण नृत्य होता है , जिसे पुरुष समूह में करते हैं ।

उत्तर प्रदेश के लोकनृत्य

चरकुला नृत्य ( या चरखुला नृत्य )

उत्तर प्रदेश के लोकनृत्य ‘ चरकुला नृत्य ( या चरखुला नृत्य ) यह ब्रज क्षेत्र का मुख्य नृत्य है । इसमें स्त्री नर्तकी लहंगा – चुनरी पहनकर सिर पर लकड़ी के स्तम्भ पर तेल के 108 दीपक जलाकर राधा – कृष्ण पर आधारित रसिया गीतों पर नृत्य करती हैं । ये नृत्य उत्तर प्रदेश के राजस्थान से लगी सीमा के क्षेत्र में भी किया जाता है ।

Advertisement

ख्याल नृत्य

ख्याल यह लोककला भारत के विभिन्न प्रान्तों में प्रचलित है , जिसका मूल स्थान उत्तर प्रदेश ही माना गया है । ये कला स्थान विशेष के नाम से ही जानी जाती है ; जैसे – जयपुरी ख्याल , कुचामणी ख्याल आदि । इसमें पौराणिक गाथाओं पर आधारित कथाओं को नृत्य द्वारा अभिव्यक्त किया जाता है । जिसके साथ ढोलक , मंजीरे , हारमोनियम , नगाड़ा आदि वाद्ययन्त्र बजाते हैं । इसमें एक सूत्रधार होता है तथा शेष सभी पात्रों का अभिनय भी केवल पुरुष ही करते हैं , स्त्रियाँ नहीं होती हैं ।

रामलीला नृत्य

• रामलीला इस नृत्य में भगवान विष्णु के अवतार श्री राम की कथाओं पर आधारित नृत्य संरचनाएँ प्रस्तुत की जाती हैं । इनके अतिरिक्त नौटंकी , स्वाँग आदि नृत्य भी किए जाते हैं ।

ब्रजभूमि का लोकनृत्य

ब्रजभूमि का लोकनृत्य ब्रजभूमि राधा और कृष्ण की नटखट अठखेलियों से सदैव स्मरणीय रहेगी । यहा का रास नृत्य भारतवर्ष में प्रसिद्ध कृष्ण नृत्य है । रास नृत्य में कृष्ण के अनेक रूपों की कल्पना और गोपियों के मध्य कृष्ण की छेड़खानी का भावपूर्ण वर्णन होता है ।

रास नृत्य में अभिनय व संगीत द्वारा रस की सृष्टि होती है । स्पष्टतः रास कृष्णलीलाओं से सम्बन्धित नृत्य का अभिनय से पूर्ण विविध लीलाओं का घोतक है । उत्तर भारत के विभिन्न जनपदों में और विशेषकर ब्रजभूमि में कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर यह नृत्य विशेष रूप से प्रचलित है । इनकी कथा वस्तु प्रायः राधा कृष्ण की प्रेम – क्रीड़ाएँ होती है । रास नृत्य का आज ग्रामीण जीवन में जो महत्त्व है , उसका मूल श्रद्धा और भक्ति भाव है ।

Advertisement

महाराष्ट्र के नृत्य

महाराष्ट्र के नृत्य – डिण्डी नृत्य वीणा जैसे ‘ डिण्डी वाद्य ‘ को बजाते हुए यह नृत्य किया जाता है । इसमें श्रीकृष्ण को लीलाओं का वर्णन करते हुए प्रमुख रूप से दही की हाण्डियों को फोड़ते हुए नृत्य करते हैं ।

तारपी नृत्य ‘ तारपी ‘ वाद्य की धुन पर नाचे जाने के कारण इस नृत्य को तारपी नृत्य कहते हैं ।

भातअल न्याचा नृत्य धान के खेतों की तरह आगे – पीछे अथवा दाएं – बाएँ झूमते हुए किया जाता है ।

दशावतार नृत्य छोटे मंच पर गणपति , सरस्वती और आठ अवतारों का अभिनय नाचते हुए करते हैं , इसलिए इसे दशावतार नृत्य कहते हैं ।

Advertisement
Advertisement

मैसूर नृत्य

मैसूर नृत्य • यक्षगान मैसूर का प्रसिद्ध नाट्य नृत्य है । • ‘ बालाकात ‘ नृत्य डोडवा कबीले का नृत्य है ।

बंगाल के नृत्य

बंगाल के नृत्य • बंगाल में चैतन्य महाप्रभु के कीर्तन में भक्तों द्वारा ढोल की थाप पर नृत्य किया जाता है , उसे कीर्तन नृत्य कहते हैं । • इसके अतिरिक्त कृष्ण लीला पर आधारित ‘ जात्रा ‘ नृत्य भी किया जाता है । बंगाल के ‘ गंजन नृत्य ‘ में पुरुष ही भाग लेते हैं , जिसमें नर्तक लकड़ी की ढाल और तलवार लेकर मैदान में ताल के आधार पर नृत्य करता है ।

Advertisement

उत्तरांचल ( उत्तराखण्ड ) के लोकनृत्य

लांगवीर नृत्य

उत्तरांचल ( उत्तराखण्ड ) के लोकनृत्य • लांगवीर नृत्य – इस नृत्य में पुरुष लम्बे बाँस पर चढ़कर केवल नाभि पर सन्तुलन कर विभिन्न प्रकार की नर क्रियाएँ करते हैं , जिसके साथ मुख्य रूप से ढोल वाद्य बजता है ।

पाण्डव नृत्य

पाण्डव नृत्य दीपावली व दशहरे के अवसर पर नर्तक महाभारत की कथाओं का गायन करते हुए नृत्य करते हैं ।

हुरका – बॉल नृत्य

हुरका – बॉल नृत्य कुमाऊँ क्षेत्र में ‘ हुरका ‘ नामक ढोल बजाते हुए ‘ बॉल ‘ गान शैली गाते हुए जो नृत्य किया जाता है , वो नृत्य ही हुरका – बॉल नृत्य कहलाता है । ये नृत्य मक्का व चावल की खेती के समय तथा वीरों की गाथाओं का गान करते समय किया जाता है । इससे नर्तक चुस्त व फुर्तीले अंग संचालन दर्शाते हुए प्रस्तुत करते हैं ।

चाँचरी नृत्य

चाँचरी नृत्य उत्तर भारत के गढ़वाल व कुमाऊँ क्षेत्र में चाँचरी नृत्य लोकप्रिय नृत्य है । यह जातीय नृत्य है , जिसमें स्त्री व पुरुष समान रूप से भाग लेते हैं । यह नृत्य गोलाकार समूह में किया जाता है , जिसमें एक ओर स्त्री व दूसरी ओर पुरुष होते हैं तथा वृत्त केन्द्रबिन्दु में दो सहायक नृत्य के साथ संगत के लिए वाद्य लेकर खड़े होते हैं तथा नृत्य के साथ संगत करते हैं , जिसमें मंजीरा व झाँझ बजाया जाता है । गीत के बोल पहले पुरुष गाते हैं , फिर स्त्रियाँ उसे दोहराती चलती हैं । चाँचरी नृत्य गीतों की कोई विशेष विषय – वस्तु तो नहीं , तथापि यह प्रेम – विषय तत्त्वों पर अधिक दिखाई देती है ।

चौफला नृत्य

चौफला नृत्य गीत गढ़वाली नृत्यों में चौफला नृत्य विशेष स्थान रखता है । खुले मैदान में स्त्री व पुरुष समान रूप से इस नृत्य को करते है । इस नृत्य शैली में गढ़वाली जीवन का यथार्थ व उल्लासमय जीवन का दिग्दर्शन होता है ।

पंजाब के लोकनृत्य

भाँगड़ा नृत्य

भांगड़ा – भाँगड़ा पंजाब का सर्वाधिक लोकप्रिय नृत्य है । भांगड़ा पंजाबियों के स्वभाव , मन के आवेश में से उभरता एक रंगीन लोकनृत्य है । इस नृत्य में न केवल हदय के भावों का प्रदर्शन होता है , तथापि पंजाबियों के जीवन 52 की झलकियाँ भी पेश की जाती है । प्रायः भांगड़ा नृत्य पंजाबी लोग फसलों की बुआई व काटने तक की कथा को इस नृत्य में करते हैं । यह ढोल की गूंज के साथ खुले प्रांगण में होने वाला नृत्य है । भांगड़ा फसल की कटाई एवं बैसाखी के साथ विशेष रूप से जुड़ा हुआ है । बच्चे , वन व जवान सभी इस नृत्य में आनन्द मग्न होकर थिरकने लगते है । इस नृत्य में सर्वप्रथम प्रांगण में ढोलवादक अपना वादन शुरू करता है , तत्पश्चात् भाँगड़ा नर्तक उसके चारों ओर नृत्य करते हैं । भांगड़ा नृत्य पंजाब में ही नहीं अपितु उत्तर भारत में विभिन्न उत्सवों पर किया जाता है ।

Advertisement
Advertisement

गिद्दा नृत्य

गिद्दा – मुख्यत : स्त्रियों का कोमल और तालियों वाला नृत्य है । यह नृत्य फसलों के पकने और कटाई के समय और वैवाहिक अवसरों पर , तीज त्यौहारों पर सामान्यतः किया जाता है । गिद्दा नृत्य में किसी वाद्य के संगत की आवश्यकता नहीं होती है । इसमें स्त्रियाँ ताली बजाकर ही गीत को गाती हुई नृत्य करती हैं । गिद्दा नृत्य में गाए जाने वाले गीतों को ‘ बोलीआँ ‘ कहते हैं ।

गुजरात के लोकनृत्य

गरबा नृत्य

गरबा नृत्य – गरबा नृत्य गुजरात की एक अनोखी देन है । शरद पूर्णिमा की रात को गुजरात की युवतियों में गरबा की उमंग छा जाती है । नवरात्रि के दिनों में गरबा बड़े उत्साह के साथ खेला जाता है । मध्यकालीन युग में गरबा का स्पष्ट रूप से जन्म हुआ ।

Advertisement

शरद की सुहानी रातें गरबा नृत्य करती हुई गुजराती महिलाओं की हथेली की ताल , पैर की पटकन व गीतों से सजीव हो उठती थी । आज भी गुजरात में गरबा का उतना ही महत्त्व है , जितना मध्यकालीन युग में था ।

लोकसंस्कृति के विशेषज्ञों का यह कहना है कि गरबा – घट गर्भ का प्रतीक है । इसके द्वारा महिलाओं की कामना प्रदर्शित होती है कि गरबी घट में एवं दीपक की तरह उनका गर्भस्थ बालक प्रकाशवान अथवा तेजस्वी हो ।

गरबा अनेक रूप में अनेक राज्यों में प्रचलित है । महाराष्ट्र में गोफा , उत्तर प्रदेश के विभिन्न रूपों में रास व आन्ध्र में कोलाटम आदि नामों से यह प्रसिद्ध है । कृष्ण का रासलीला नृत्य गरबा की शैली पर होने वाले नृत्य जैसा है । आजकल यह एक सम्मिलित नृत्य के रूप में अथवा यूँ कहिए कि विभिन्न शहरों में लड़के व लड़कियों के अलग – अलग दलों में गरबा प्रतियोगिता होती है । गुजरात के संगीत की आत्मा मुख्यतः गरबा ही है , जोकि मध्यकालीन युग की सबसे बड़ी देन है ।

डाण्डिया नृत्य

गुजरात के डाण्डिया नृत्य में श्रीकृष्ण की लीलाओं का वर्णन होता है । सभी नृत्य कलाकार ( स्त्री व पुरुष ) दोनों हाथों में डण्डे ( डाण्डिया ) लेकर , बाँसुरी , ढोल , झाँझ , मंजीरों आदि वाद्यों की धुनों व संगीत के साथ नृत्य करते हैं ।

Advertisement

राजस्थान के लोकनृत्य

राजस्थान के लोकनृत्य उत्तर भारत के सभी लोकनृत्यों में राजस्थानी नृत्य मनमोहक होते है । घूमर राजस्थान का सामूहिक नृत्य है , जिसमें स्त्रियाँ समूह में एकत्रित होकर नृत्य करती है । यह नृत्य विशेषतः घेरे में होता है । राजस्थान में गणगौर , दीपावली व होली पर्व पर घूमर नृत्य मुख्य रूप से लोकप्रिय नृत्य है । राजस्थान राजपूताना प्रदेश है । यहाँ राजपूत जाति मुख्य रूप से है । इस जाति में अलग – अलग उपजातियाँ है , इन उपजातियों की चर्चा ही इन गीतों में होती है । यह नृत्य गृह देवियों द्वारा एक सामूहिक नृत्य है , जिसमें मीठे व्यंग्य होते है । इस नृत्य के साथ ढोल बजाया जाता है ।

राजस्थान के प्रमुख लोकनृत्य पणिहारी , कालबेलिया तेरहताली कलपुतला कर घरी , अमर , भवाई , परखला आदि है , जिनका विवरण निम्नलिखित है -•

Advertisement

पणिहारी नृत्य

राजस्थान के मरुस्थलीय प्रदेश होने के कारण यहा अमृत पाजल परसपुर पणिहारी नृत्य लोकनृत्य गीत की रचना की गई है । पणिहारी लोकनृत्य गीत राजस्थान का परिसर नृत्य गीत है । • यह मृत्य विशेषत : स्त्रियाँ जब पनघट पर पानी भरने जाती है तब पाती है जिसए भाव होता है कि किसने कुओं और बावड़ी खुदवाए है । इसमे नायिकाएं नृत्य के माध्यम से नृत्यगोत में पूछे गए प्रश्नों के उत्तर स्वरूप नृत्य के माध्यम अभिव्यक्त करती है ।

कालबेलिया नृत्य

कालबेलिया नृत्य • राजस्थान का कालबेलिया नृत्य जाति आधारित नृत्य है , जिसे सपेरा जाति के कुछ लोगों ने अपनी जीविकोपार्जन का साधन भी बना लिया है । सपेरा जाति के लोगो को कालबेलिया कहा जाता है । इस जाति के लोग बीन ( पुगी ) बजाते है और सांपों का प्रदर्शन करते हैं । • काले नाग को वशीभूत कर उसका खेल दिखाने के कारण ही इस जाति का नाम ‘ कालबेलिपा ‘ पड़ा । कालवेलिए लोग खंजरी भी बजाते हैं और पैरो मे ( भक बांध कर कालबेलिया नृत्य करते है । इस जाति को स्त्रिया स्वस्थ , सुन्दर व फुर्तीली होती है । इनकी पोशाकों में भी कलात्मकता होती है । ये पोशाके काले रंग की होती है , जिस पर गोटा लगा रहता है । कालबेलियों का ‘ शंकरिया ‘ गीत प्रसिद्ध है । पुंगो पर सपेरे जाति के लोग इण्डोणी और पणिहारी गीत बजाते हैं । इस नृत्य में शारीरिक लचक को प्रधानता रहती है । इसके नृत्यकार , नृत्य करते हुए विभिन्न प्रकार की कलाबाजियों दिखाते हैं । वर्तमान में कालबेलिया नृत्य को जग प्रसिद्धि दिलाने में गुलाबो मृत्यांपदा को महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है ।

तेरहताली नृत्य

तेरहताली नृत्य • राजस्थान की कामह जाति के लोग प्रमुख रूप से तेरहताली नृत्य में प्रवीण होते है । कामड़ स्त्रियाँ अपने शरीर पर छोटे – छोटे तेरह मंजीरे बांधती हैं और ताल न लय के साथ अपने हाथ व पैरों पर बंधे हुए मंजीरों को उनसे टकराती ( बजाती ) हुई नृत्य करती है । मंजीरे बजाते हुए वे तेरह प्रकार की क्रियाओ का अधिस्य करती है , इसलिए इस नृत्य का नाम तेरहताल ( तेरहताली नृत्य ) नृत्य पड़ा । इसकी नर्तकी अपने इष्टदेव रामदेव जी के समक्ष रातभर पाती – धजाती हैं । कामड़ नर्तकियाँ मंजीरे बंधे पाँव को फैलाकर अपने सिर पर कांसे के थाल एवं लोटा जिस पर जलता दीपक रखकर मुंह में तलवार लिए जमीन पर बैठी बैठो । अपने नृत्य की शुरुआत करती है । • इस दौरान ये नृत्यांगना कभी लेटी हुई , तो कभी घूमती हुई तरह – तरह की भावाभिव्यक्तियाँ देती है । अन्त में बहुत तेज गति में कांसे को भारी थालियाँ लेकर अंगुलियों पर घुमाती है ।

कठपुतली नृत्य

कठपुतली नृत्य • कठपुतली नृत्य कला न केवल भारत में वरन् विदेशों में भी परिसर है । कनाडा , कोरिया , वियतनाम , उज्वेकिस्तान ( ताशकन्द ) , जर्मनी , इण्डोदेशिया आदि देशों में कठपुतली नृत्य कला का प्रदर्शन हो चुका है । पुतली से तात्पर्य । है कि मनुष्य द्वारा निर्मित कोई ऐसी आकृति , जो मनुष्य द्वारा ही संचालित और गतिमान होती है । • हाथों द्वारा नचाने वाली यह पुतली काष्ठ ( लकड़ी ) से धनी होती है । अतः जब मानव ‘ काष्ठ ‘ द्वारा बनी आकृति को अपनी अंगुलियों पर नचाता है , तो वह कलाकृति ( काष्ठपुतली ) कठपुतली कहलाती है ।. कठपुतली मनुष्य की एक अनूठी एवं शानदार रचना है , जिसके माध्यम से कथा कहते हुए या नाटक का प्रदर्शन करते हुए पौराणिक गाथाओं , कथाओं तथा शिक्षाप्रद कहानियों की अभिव्यक्ति की जा सकती है , जससे बालकों के मनोरंजन के साथ – साथ उनका ज्ञानात्मक विकास भी होता है । काष्ठ के अतिरिक्त पुतलियाँ , चिकनी मिट्टी , पेपरमेशी , अनुपयोगी सामग्रियों आदि से भी निर्मित की जा सकती हैं । राजस्थान में कठपुतली प्रशिक्षण का मुख्य केन्द्र ‘ उदयपुर ‘ में है । कठपुतली प्रशिक्षण हेतु ‘ भारतीय लोक कलामण्डल ‘ , उदयपुर के तत्वावधान में ‘ गोविन्द शैक्षिक कठपुतली प्रशिक्षण केन्द्र ‘ संचालित है । कठपुतलियों के तीन प्रकार निम्नलिखित है 0 दस्ताना कठपुतली इसमें अँगुलियों में धागे बाँधकर या हाथों में दस्ताना पहनकर कठपुतली का खेल दिखाया जाता है । ( ii ) छड़ी कठपुतली इसमें हाथ की जगह छड़ी के माध्यम से कठपुतली का खेल दिखाया जाता है । ( it ) रुमाल कठपुतली इस प्रकार में रुमाल को विशेष प्रकार से बल द्वारा गाँठ लगाकर बनाई जाती है , परन्तु इनका संचालन हाथों द्वारा ही किया जाता है ।

Advertisement
Advertisement

चकरी नृत्य

चकरी नृत्य • चकरी का तात्पर्य चक्र से है । इस नृत्य में राजस्थानी किशोरियाँ बिजली को भी मात देने वाली गति में चक्कर लगाकर नृत्य करती हैं । इस नृत्य में पुरुष व स्त्रियाँ दोनों ही भाग ले सकते हैं । • इसमें कलाकार घेरे में नृत्य करते हैं । एक या दो घेरे अर्थात् एक बड़े घेरे के भीतर एक और छोटा घेरा बनाकर भी नृत्य किया जाता है । बाहर के घेरे के लोग बाकी ओर से दाईं ओर अन्दर के घेरे में दाईं ओर से बाई ओर घूमते हैं । लय के ठहराव के साथ एक झटके में गति व दिशा दोनों ही बदल दी जाती हैं । मांदल इस नृत्य का प्रमुख वाद्य है ।

चरी नृत्य

चरी नृत्य • राजस्थानी लोकनृत्यों में चरी नृत्य भी प्रचलित है । चरी लोकनृत्य विभिन्न उत्सवों में किया जाता है । इसमें महिलाएं सिर पर मिट्टी अथवा धातु के घड़े या चरी रखती हैं । • चरी के ऊपर दीपक रखा जाता है । इस नृत्य में ढोल , थाली इत्यादि वाद्य बजाए जाते हैं । इस नृत्य को भी महिलाएँ गोल घेरे में घूमते हुए करती है । किशनगढ़ के गुर्जर जाति का चरी नृत्य प्रसिद्ध है । किशनगढ़ की फलकू बाई चरी नृत्य की प्रसिद्ध कलाकार हैं ।

झूमर नृत्य

झूमर नृत्य – झूमर ‘ नामक वाद्ययन्त्र बजाते हुए , जिस नृत्य की प्रस्तुति की जाती है , वही नृत्य ‘ झूमर नृत्य ‘ कहलाता है । मूलत : गुर्जर जाति के लोग यह नृत्य करते हैं , पर अहीर जाति में भी इस नृत्य को करने की प्रथा देखी जाती है । . • यह नृत्य पुरुषों का वीररस प्रधान नृत्य है । कभी – कभी स्त्री व पुरुष दोनों मिलकर भी इस नृत्य में प्रस्तुति देते हैं । यह नृत्य धार्मिक मेले व पर्वो पर किया जाता है ।

भवाई नृत्य

भवाई नृत्य • इस नृत्य के सम्बन्ध में ऐसी मान्यता रही है कि 400 वर्ष पूर्व नागों जी जाट के सामूहिक नाच करने वालों ने भवाई जाति की स्थापना की , जो वर्तमान तक नृत्य – नाट्य पेशे के रूप में प्रस्तुत करती चली आई है ।रण 53 भवाइयों में कई प्रकार के नाच हैं ; जैसे – बीकाजी , शंकरिया , ढोलामारू , कमल का फूल , मटकों का नाच , तलवार का नाच आदि । मेवाड़ के भवाई सिर पर पाँच – पाँच या सात – सात घड़े रखकर नाचते हैं । ©

Advertisement

भवाई नृत्य की मुख्य विशेषताएँ

  • नृत्य अदायगी शारीरिक क्रियाओं के अद्भुत चमत्कार तथा लयकारी की विविधता है । इनके नृत्य और वाद्य वादन में शास्त्रीय कला की झलक मिलती है । तेज लय में विविध रंगों की पगड़ियों को हवा में फैलाकर अपनी अँगुलियों से नृत्य करते हुए कमल का फूल बनाना , काँच के टुकड़ों व नुकीली कीलों पर नाचना , थाली के किनारों पर नृत्य करना , तलवार की धार पर नृत्य करना आदि इस नृत्य की विशेषताएँ हैं । यह नृत्य राजस्थान के मेवाड़ क्षेत्र में विशेषकर उदयपुर में अधिक लोकप्रिय है ।
  • वर्तमान में स्त्री व पुरुष दोनों ही कलाकार इस कलात्मक व लयात्मक नृत्य की प्रस्तुति देते हैं । राजस्थान का ये नृत्य उत्तर प्रदेश के ‘ नौटंकी ‘ , बंगाल के ‘ जागा ‘ तथा गुजरात के भवाई ‘ के समान है । इस नृत्य में विषय – वस्तु की प्रधानता होती है ।

चरखुला नृत्य

  • सम्भवत : चक्र या चक्कर काटने के अर्थ से ही इस नृत्य का नाम चरखुला पड़ा है । चरखुला जिसे सिर पर रखकर नृत्य किया जाता है , इसकी बनावट विशेष प्रकार की होती है । एक बड़ा चार फीट की लकड़ी का चकरा बना होता है , जिस पर लोहा जड़ा होता है ।
  • उसके बीच में एक लम्बी छड़ी होती है , जिस पर बीच – बीच में कलश लगे होते हैं । कुल चार चौक बनते हैं । इन पर दीप ( तेल के ) जलाए जाते हैं । ठीक ऊपर भी एक दीपक जलता रहता है । इस प्रकार कुल एक सौ एक दीपकों से जगमगाता यह भारी ‘ चरखुला उठाकर नर्तकी के सिर पर रखा जाता है ।
  • चरखुला नर्तक – नर्तकी के साथ अन्य पात्र राधा – कृष्ण के वेश में रास करते हैं । यह नृत्य गणगौर , तीज व अन्य मेलों के अवसर पर विशेष रूप से किया जाता है । यह नृत्य अलवर , भरतपुर , डीग के आस – पास के क्षेत्रों में अधिक प्रचलित है । उत्तर प्रदेश की ब्रजभूमि में दीपावली के अवसर पर इस नृत्य की विशेष धूमधाम रहती है ।
  • इस नृत्य में अन्तिम सौन्दर्य की विभिन्न मुद्राओं के प्रस्तुतीकरण के साथ – साथ लयात्मक सौन्दर्य , सांगीतिक माधुर्य एवं कलाकार का शारीरिक सन्तुलन देखने को मिलता है ।
  • अतः भारतीय लोकवाद्य , लोकनृत्यों का हमारी लोकसंस्कृति व लोक परम्पराओं को पीढ़ी – दर – पीढ़ी हस्तान्तरित करने में अविस्मरणीय भूमिका है ।

सप्त स्वर ज्ञान से जुड़ने के लिए आपका दिल से धन्यवाद ।

Advertisement
Advertisement

Share the Knowledge

Leave a Comment