दिल्ली घराना ( ख्याल गायकी ) Delhi Gharana

दिल्ली घराना in Hindi – ख्याल गायकी के महत्त्वपूर्ण घराने की बात अगर हम करें तो इसमें कई और घराने भी शामिल हैं , जैसे – आगरा घराना, ग्वालियर घराना, किराना घराना , पटियाला घराना । इन सब घराने के बारे में आप अन्य लेख में जानेंगे । इस लेख में हम जानेंगे दिल्ली घराने के बारे में ।

दिल्ली घराना

  • • ख्याल गायिकी का दिल्ली घराना एक प्राचीन घराना रहा है । 13 वीं शताब्दी में दिल्ली के समकालीन सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के समय प्रख्यात अमीर बढ़ाया । खुसरो तथा इनके पीर भाई सामंती ने ख्यालों के सन्दर्भ में इस घराने को आगे
  • ● आज सांगीतिक जगत में चारों ओर ख्याल का ही बोल – बाला है । इसी आधार पर उत्तर भारतीय संगीत में मुख्य रूप से पहचाने जाने वाले घरानों में से एक प्रमुख घराना दिल्ली घराना है । मुगल बादशाहों के पतन के बाद दिल्ली घराने की स्थापना का श्रेय तानरस खाँ जी को जाता है ।
  • • इस घराने की परम्परा दिल्ली दरबार के सुप्रसिद्ध गायक व तानरस खाँ के गुरु अचपल मियाँ से प्रारम्भ होती है । यहाँ तक कि मियाँ अचपल को दिल्ली ‘ घराने के खलीफा ‘ के रूप में स्वीकार किया गया ।
  • महोदय भगवत शरण शर्मा के अनुसार , ” दिल्ली के ‘ डसाना ‘ नामक कस्बे में रहने वाले कादिर बख्श तथा इनके पुत्र कुतुब बख्श , जिनको बहादुरशाह जफर द्वारा तानरस खाँ की उपाधि प्रदान की गई थी , ये तानरस खाँ ही इस घराने के संस्थापक कहे गए । ”

विशेषताएँ – दिल्ली घराना

दिल्ली घराने की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  • राग की शुद्धता एवं सुन्दरता इस घराने की प्रमुख विशेषता रही । इस घराने की गायिकी का अपना अलग अन्दाज है , इसका सम्बन्ध मुख्यतः सारंगियों से होने के कारण इसकी विलम्बित लय की चीजों में सूत , मीन्ड , गमक और लहक का काम विशेष रूप से परिलक्षित होता है ।
  • मध्य लय में स्वरों का परस्पर लड़ – गुँथाव तथा जोड़ – तोड़ का काम अपनी विशिष्टता को प्रस्तुत करता है ।
  • संगीत जगत में तानों की जोड़ – तोड़ सह – विविधता और वैचित्र्यता हेतु इस घराने का विशेष स्थान है ।

प्रमुख कलाकार

विद्वानों के अनुसार , दिल्ली घराना केवल ख्याल गायन में ही पारंगत नहीं था , अपितु वाद्य संगीत में अपना विशिष्ट स्थान रखने वाले बहुत से कलाकार यहाँ उत्पन्न हुए ; यथा – उमराव खाँ के शिष्यों में सरदार खाँ और अब्दुल अजीज खाँ ने प्रसिद्धि पाई ।
नन्हे खाँ , मम्मन खाँ तथा सारंगी वादक बुन्दू खाँ भी इस गायिकी को आगे बढ़ाने वाले प्रमुख कलाकार थे । उस्ताद नसीर अहमद खाँ की शिष्याएँ श्रीमती कृष्णा बिष्ट एवं भारती चक्रवर्ती भी अपने प्रयत्नों से इस घराने को उन्नति के मार्ग पर अग्रसर करने हेतु समर्थ रहीं ।

उपसंहार / सार / Conclusion / निष्कर्ष

कुछ विद्वानों के मतानुसार , यदि दिल्ली घराने को ही सभी घरानों की जड़ मान लिया जाए , तो यह इसके विषय में अतिशयोक्ति नहीं होगी । खलीफा की उपाधि से विभूषित मियाँ अचपल से प्रारम्भ दिल्ली परम्परा की प्रतिनिधित्वता वर्तमान समय में उस्ताद चाँद खाँ से मानी जाती है । साथ ही इनके पुत्र उस्ताद नसीर अहमद खाँ , उस्ताद हिलाल अहमद खाँ को प्रतिष्ठित गायकों की श्रेणी में रखा जाता है ।

इस प्रकार यह घराना ख्याल गायिकी का प्रतिष्ठित व विलक्षित घराना रहा है । इस घराने में तानों के विशिष्ट एवं विचित्र नाम हैं । इस घराने में सारंगी और सुरसागर जैसे तन्तु वाद्यों का विशेष प्रचलन रहा है ।

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