वायलिन वाद्य यन्त्र का परिचय, अंग, मिलाने की पद्धति- Violin vadya yantra

वाद्य यन्त्र वायलिन ( बेला ) – वायलिन ( Violin ) या बेला एक विदेशी वाद्य है । गज से बजनेवाले समस्त वाद्यों में इसे सर्वत्र प्रतिष्ठा की दृष्टि से देखा जाता है । इस यंत्र की उत्पत्ति और आविष्कार के बारे में विभिन्न मत पाए जाते हैं ।

वाद्य यन्त्र वायलिन का आविष्कार

जो लोग इसे विदेशी वाद्य मानते हैं , उनके मतानुसार इस का आविष्कार यूरोप में 16वीं शताब्दी के मध्य हुआ और तभी से यह अधिकाधिक प्रचलित होता गया है ।

एक मत के अनुसार ‘Violin/ बेला ‘ को मूल रूप में भारतीय वाद्ययंत्र कहा जाता है । इस मत के अनुयायियों का कहना है कि लंकापति रावण ने एकतारवाला एक वाद्ययंत्र ईजाद किया था जिसे गज़ से ही बजाया जाता था । उसका नाम ‘ रावणास्त्रम् ‘ रखा गया ।

इसके पश्चात् 11वीं शताब्दी के अंत में यह वाद्य भारत होकर परशिया , अरेबिया तथा स्पेन होता हुआ यूरोप पहुंचा । वहाँ इसमें परिवर्तन होते हुए वर्तमान वॉयलिन के रूप में इसका पूर्ण विकास हो गया ।

एक पाश्चात्य विद्वान् के मतानुसार , 400 वर्ष पहले यूरोप में ‘ वॉयल ‘ ( voil ) नामक एक वाद्ययंत्र का आविष्कार हुआ , जिसका प्रचार सोलहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध तक रहा । बाद में इसी वॉयल यंत्र के ढंग पर वायलिन बनाया गया ।

एक और मतानुसार 1563 ई ० में वेनिस नगर के एक ग्रामीण लीनारोनी ने ‘ टेनर वॉयलिन ‘ का आविष्कार किया था । उसी के आधार पर इटली के दो कलाकारों ने इसमें कुछ और विशेषताएं सम्मिलित करके इसे नवीन रूप दिया । कोई – कोई इसे जर्मनी का आविष्कार भी बताते हैं ।

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इस प्रकार वायलिन के सम्बन्ध में अनेक धारणाएँ पाई जाती हैं । कुछ भी सही , यह तो मानना ही पड़ेगा कि अपने आधुनिक रूप में यह पूर्णरूपेण एक विदेशी वाद्य है । भारत में विशेषकर दक्षिण भारत में इसका प्रचार दिनों – दिन बढ़ रहा है । अच्छे वायलिन वादक भी अब यहाँ अनेक हो गए हैं ।

वाद्य यन्त्र वायलिन के अंग

वायलिन ( बेला ) के छह मुख्य अंग होते हैं :

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वायलिन वाद्य यन्त्र

1. बॉडी ( Body ) आवाज़ गंजती है । इसे ‘ बेली ‘ भी कहते हैं । इसे वायलिन का शरीर समझिए । अन्दर से पोला होने के कारण इसमें

2. फिगर – बोर्ड ( Finger Board ) – इस पर अंगुलियों की सहायता से स्वर निकाले जाते हैं ।

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3. टेल – पीस ( Tail Piece ) – वह भाग है , जिसमें चार सूराख होते हैं । इन चारों सूराखों में होकर चार तार खूटियों तक जाते हैं ।

4. एन्ड – पिन ( End Pin ) -इसमें टेलपीस ताँत के द्वारा फंसा रहता है ।

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5. ब्रिज ( Bridge ) – इसके ऊपर होकर तार खूटियों की ओर जाते हैं ।

6. साउंड – पोस्ट ( Sound Post ) – यह वायलिन के अन्दर ब्रिज के ठीक नीचे लगा रहता है ।

गज ( Bow ) और उसके भाग

वायलिन जिस छड़ी ( गज ) से बजाया जाता है , उसे ‘ bow ‘ कहते हैं ।

bow के पाँच भाग होते हैं :1. गज की छड़ी ( Stick ) , 2. बाल ( Hair ) – ये गज़ की छड़ी में कसे रहते हैं , 3. स्क्रू ( Screw ) – एक प्रकार का पेच , जिसे उलटा या सीधा करने से ‘ Bow ‘ ( गज़ ) के बाल तनते या ढीले होते हैं , 4. नट ( Nut ) – इसमें बाल फेसे रहते हैं और जब पेंच घुमाया जाता है तो यह सरकने लगता है तथा 5. हेड ( Head ) – यह ‘ Bow ‘ का अंतिम सिरा है ।

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2. रेजिन ( Resin ) – यह एक प्रकार का विरोजा ( रेजिन ) होता है । इस पर ‘ Bow ‘ ( गज ) के बाल घिसकर तब वॉयलिन बजाते हैं । इससे आवाज स्पष्ट और सुन्दर निकलती है ।

वाद्य यन्त्र वायलिन मिलाने की पद्धति

वायलिन के चार तार और उन्हें मिलाने की पद्धति

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वायलिन में कुल चार तार होते हैं , जो अंग्रेजी में क्रमशः जी , डी , ए , ई . ( GDA E ) कहलाते हैं । इनको मिलाने के ढंग कई प्रकार के हैं : –

प्रथम प्रकार –

प सा प सां , इस प्रकार मिलाते हैं । यानी मंद्र – सप्तक का पंचम , मध्य – सप्तक का षड्ज , मध्य – सप्तक का पंचम और तार – सप्तक का षड्ज ।

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दूसरा प्रकार –

स प सा प इस तरह मिलाते हैं । यानी पहले दोनों तार मंद्र – सप्तक के षड्ज पंचम में और बाकी दो तार मध्य – सप्तक के षड्ज – पंचम में ।

तीसरा प्रकार –

म सा प रें , इस प्रकार मिलाते हैं । भारत में अधिकतर यह तीसरा प्रकार ही प्रचलित है ।

सप्त स्वर ज्ञान से जुड़ने के लिए आपका दिल से धन्यवाद ।

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