प्रमुख संगीत शिक्षण संस्थान – Shikshan Sansthaan

हिन्दुस्तानी संगीत के प्रमुख शिक्षण संस्थान

प्रमुख शिक्षण संस्थान ( संगीत ) – हिन्दुस्तानी संगीत के प्रचार – प्रसार में शिक्षण संस्थानों की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है । शिक्षण संस्थाओं की स्थापना ने कला के विभिन्न स्वरूपों को कुशलतापूर्वक स्थापित करने में अपनी भूमिका निभाई । इसी क्रम में विभिन्न शिक्षण संस्थाओं की स्थापना की गई ।


भारत में संगीत विधा का विकास

भारत में संगीत विधा का विकास अनादि काल से भारतीय जनजीवन संगीत से सम्बद्ध रहा है । जनजीवन के हर छोटे – बड़े कृत्य , अनुष्ठान , उत्सव , विभिन्न कार्य किसी – न – किसी रूप में संगीत द्वारा सम्पन्न होते रहे हैं। मिथकों , पौराणिक ग्रन्थों और वेदों में हम संगीत को देख सकते हैं ।

भारतीय संगीत , चाहे ईश्वर की आराधना हो या परब्रह्म की उपासना , साधकों की साधना हो या मनोरंजन, लोकरंजन की वस्तु , जन – जीवन का अभिन्न अंग रहा है ।

संगीत प्रतिदिन दिनचर्या का साथी रहा है । इस तरह से संगीत का स्तर संस्कृति पर निर्भर करता है ।

संगीत चाहे भारतीय हो या पाश्चात्य अपने विकास के लिए साधन या सामग्री जन – जीवन से ही जुटाता रहा है । इसी कारण यह देखा गया है कि सभ्यता का विकास होता है तो संगीत भी उसके अनुकूल विकसित होता है ।

भारत में संगीत विधा को सामान्यतः दो भागों में विभाजित करके देखा जाता है प्रथम कर्नाटक विधा एवं दूसरी हिन्दुस्तानी शास्त्रीय विधा । इन दोनों का परम्परागत तथा संस्थागत विकास समय के सापेक्ष होता रहा है ।

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जहाँ तक हिन्दुस्तानी संगीत के प्रमुख शिक्षण संस्थान का प्रश्न है उसको विभिन्न अकादमियों , प्रसार भारती, गीत एवं नाटक प्रभाग तथा फिल्मों के योगदान के सन्दर्भ में देख सकते हैं।

इसी क्रम में संगीत विधा के बदलते स्वरूप एवं उसके अभ्युदय के लिए समय – समय पर अनेक शिक्षण संस्थाओं की स्थापना की गई, जिसका उद्देश्य संगीत का प्रशिक्षण देना एवं संगीत में बदलते स्वरूपों का प्रचार-प्रसार करना भी रहा ।

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इस कार्य में शिक्षण संस्थाओं की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है ।

संगीत के प्रमुख शिक्षण संस्थान

भारत में संगीत शिक्षण संस्थाओं एवं प्रारम्भिक स्तर पर विद्यालय स्थापना का इतिहास पुराना रहा है । प्राचीनकाल से लेकर आधुनिक काल तक संगीत के उत्थान में शिक्षण संस्थाओं का विशेष महत्त्व है ।

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बदलते समय के अनुरूप भले ही शिक्षण संस्थानों का स्वरूप बदला , किन्तु उनका उद्देश्य संगीत का विकास एवं संगीत का प्रशिक्षण देना ही है ।

19 वीं शताब्दी में घराने एक प्रकार से शिक्षण संस्था के प्रमुख केन्द्र के रूप में कार्य करते रहे हैं । इसी शताब्दी को भारतीय संगीत के पुनरुत्थान का काल माना जाता है । 

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विद्यार्थी के अंदर संगीत के प्रति गहरी समझ पैदा करना और अध्येता ( अध्ययन करने वाला , पाठक ) के गुण को स्थापित करना इन संस्थाओं का गुण है । इसी क्रम में भारत में समय – समय पर कई क्षेत्रीय एवं राष्ट्रीय स्तर पर संगीत शिक्षण संस्थाओं की स्थापना की गई।

प्रमुख शिक्षण संस्थान निम्नलिखित हैं – ( नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करके जानकारी प्राप्त करें। )

अगले अध्याय में हम जानेंगे ‘ इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केन्द्र ‘ के बारे में । आगे आपको कई सारे शिक्षण संसथान के बारे जानकारी मई इस अध्याय में जोड़ता रहूँगा, तो सब्सक्राइब करे , शेयर करें और बने रहें सप्त स्वर ज्ञान के साथ।
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