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ख्याल गायन शैली की विधि, भेद – अध्याय (6/22) Khayal Gayan Shaili

ख्याल गायन शैली

अध्याय 6 – ” ख्याल गायन शैली ” |  गायन के 22 प्रकार

  1. गायन
  2. प्रबंध गायन शैली
  3. ध्रुपद गायन शैली
  4. धमार गायन शैली
  5. सादरा गायन शैली
  6. ख्याल गायन शैली
  7. तराना
  8. त्रिवट
  9. चतुरंग
  10. सरगम
  11. लक्षण गीत
  12. रागसागर या रागमाला
  13. ठुमरी
  14. दादरा
  15. टप्पा
  16. होरी या होली
  17. चैती
  18. कजरी या कजली
  19. सुगम संगीत
  20. गीत
  21. भजन
  22. ग़ज़ल

ख्याल गायन शैली – ‘ ख्याल ‘ हिन्दुस्तानी कण्ठ संगीत की सर्वाधिक प्रिय ( लोकप्रिय ) शैली ‘ ख्याल ‘ फारसी भाषा का शब्द है । ख्याल का अर्थ विचार या कल्पना है । जब एक गायक अपनी प्रौढ़ कल्पना को स्वर , लय , तान के माध्यम से सांगीतिक आकार देता है , तो उसे ख्याल कहा जाता है । प्रसिद्ध सूफी सन्तों की रचना ख्याल कही गई है । कल्पना ख्याल शैली का ही प्राण है ।

ख्याल गायन शैली का आविष्कार

ख्याल का आविष्कार यह गीत शैली कब से प्रारम्भ हुई , इसके विषय में दो मत पाए जाते हैं । एक तो यह कि इसका आविष्कार ई . 14 में अमीर खुसरो ने किया और दूसरा यह कि इसकी परम्परा प्राचीनकाल से ही चली आ रही है । 

विद्वानों के अनुसार , मध्यकालीन संगीत में प्रचलित ‘ रूपक ‘ नामक प्रबन्ध से ख्याल शैली का विकास हुआ है । एक मत के अनुसार ख्याल का आविष्कारक अमीर खुसरो को माना जाता है , लेकिन उसके ग्रन्थों को देखने पर यह ज्ञात होता है कि उस समय कव्वाली आदि , प्रचार में ख्याल का उल्लेख नहीं मिलता है । तानसेन के समय में भी ख्याल गीत का नाम सुनने में नहीं आता , क्योकि इस समय तो ध्रुपद गायकी प्रचलित थी । ऐसा माना जाता है कि ब्रज के कुछ प्रदेशों में ख्याल नामक लोकगीतों की परम्परा प्राप्त होती है ।

‘ चौरासी वैष्णवन की वार्ता ‘ नामक वार्ता साहित्य में एक गायिका द्वारा ख्याल और टप्पा नामक गीतों के गायन का उल्लेख है । अत : इस शैली के निर्माण में तत्कालीन ख्याल गीतों का योगदान रहा हो , तो कोई आश्चर्य नहीं है ।

18 वीं शताब्दी में सुल्तान मुहम्मद शाह के दरबारी गायक नियामत खाँ ( सदारंग ) ने इस शैली को शास्त्रीय संगीत में प्रतिष्ठा दिलाई , उनकी ख्याल की अनेक रचनाएँ पीढ़ी – दर – पीढ़ी से प्रचलित रही हैं । सदारंग स्वयं तानसेन के वंशज थे और इनकी अपनी तथा उनके वंशज की गायिकी ध्रुपद गायकी थी , लेकिन युग परिवर्तन की प्रवृत्तियों को ध्यान में रखकर इन्होंने ख्याल गीतों का प्रवर्तन किया , जिसमें स्वर सौन्दर्य के आविष्कार के लिए पर्याप्त स्थान था ।

ध्रुपद की लयकारिता और कव्वाली की तान , इन दोनों के सम्मिश्रण से ख्याल गायकी का निर्माण हुआ । मतभेद चाहे कितने भी रहे हों , परन्तु आधुनिक काल में ख्याल गायन सबसे प्रमुख गायन शैली बन चुकी है ।

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ख्याल गायन की विधि

ख्याल गायन को प्रारम्भ करने की दो शैलियाँ प्रचलित हैं । ‘ ख्याल ‘ की गायकी ‘ लचीली ‘ है , इसमें गायक स्वतन्त्र रूप से विचरण कर सकता है । 1. प्रथम ख्याल की बन्दिश शुरू करने से पहले राग के स्वरूप का आलाप विस्तारपूर्वक करना । 2. दूसरा राग के स्वरूप को स्थापित करने हेतु अकारादि में अत्यन्त संक्षिप्त आलाप करना ।

ख्याल के भेद

ख्याल गायन लय , परम्परा और विधि के आधार पर तीन प्रकार से भेद किया जाता है –

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  1. विलम्बित ख्याल – यह ख्याल गम्भीर प्रकृति का होता है । इसके प्रचारक सदारंग – अदारंग दो भाई माने जाते हैं । ये दोनों भाई मुहम्मद शाह रंगीले के दरबारी गायक थे । बड़े ख्याल का आलाप व बोलालाप द्वारा विस्तार किया जाता है । यह शृंगार , शान्त व करुण रस प्रधान होता है । विलम्बित ख्याल का आविष्कार १६ वीं शताब्दी में सुल्तान हुसैन शक ने किया । इसके गीत को स्थायी एवं अन्तरा नामक दो भागों में बाँटा गया है । इसमें एकताल , झूमरा , तिलवाड़ा , आड़ा – चौताल आदि प्रयोग होती हैं ।
  2. मध्य लय के ख्याल – इस प्रकार के ख्याल में लय साधारण रहती है । इसमें चंचलता का समावेश होता है । लय के साथ शब्दों व स्वरों का खिलवाड़ करते हुए बोलतान व तान आदि गाते समय गायक को अपनी कला कौशल व प्रतिभा दर्शाने का पूर्ण अवसर मिलता है ।
  3. द्रुत ख्याल – इस ख्याल की उत्पत्ति 14 वीं शताब्दी में अमीर खुसरो ने की । अमीर खुसरो ने सर्वप्रथम कव्वाली ख्याल का प्रचार किया और उसी को वर्तमान में द्रुत ख्याल कहकर पुकारा जाता है । इसमें शृंगार या करुण रस प्रधान होते हैं । स्थायी व अन्तरा इसके दो भाग होते हैं । इसमें शब्द अधिक होते हैं एवं ठहराव कम होता है । छोटे ख्याल में आलाप , बोलालाप , बोल – तानें व सरगम प्रमुख रहती हैं । छोटे ख्याल में मध्य लय की तालों – एकताल , त्रिताल , झपताल , तीनताल तथा रूपक आदि का प्रयोग किया जाता है । 

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