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दक्षिण भारतीय संगीत कला का इतिहास -Bhartiya Sangeet kala (8/9)

दक्षिण भारतीय संगीत कला

हिन्दुस्तानी संगीत के ऐतिहासिक विकास का अध्ययन ( 8/9 )

  1. वैदिक काल में संगीत- Music in Vaidik Kaal
  2. पौराणिक युग में संगीत – Pauranik yug me Sangeet
  3. उपनिषदों में संगीत – Upnishadon me Sangeet
  4. शिक्षा प्रतिसांख्यों में संगीत – Shiksha Sangeet
  5. महाकाव्य काल में संगीत- mahakavya sangeet
  6. मध्यकालीन संगीत का इतिहास – Madhyakalin Sangeet
  7. मुगलकाल में संगीत कला- Mugal kaal Sangeet Kala
  8. दक्षिण भारतीय संगीत कला का इतिहास – Bhartiya Sangeet kala
  9. आधुनिक काल में संगीत – Music in Modern Period

8. दक्षिण भारतीय संगीत कला का काल

दक्षिण भारतीय संगीत कला का इतिहास

• यह काल 1850 से 1947 ई . तक का है । इस काल के आरम्भ मे ही संगीत के पतन की ओर अग्रसर हो रहा था । अंग्रेज भारतीय संगीत को अच्छा दृष्टि से नहीं देखते थे । उस समय में संगीत का दीपक कुछ रियासतों में ही जल रहा था । संगीत की पवित्र भावना लुप्त हो चुकी थी । अब संगीत अमोद – प्रमोद व मनोरंजन का साधन मात्र रह गया था ।

• दक्षिण भारत में त्यागराज ने कई गीतों की रचना की । इसी समय दक्षिण के श्यामा शास्त्री , सुबराम दीक्षित आदि संगीतकारों ने संगीत कला का खूब प्रचार किया ।

• समूचे उत्तर भारत व कुछ दक्षिण में भी अरबी संगीत कला की छाप भारतीय संगीत पर पड़ चुकी थी , तब महाराष्ट्र ही एक ऐसा प्रान्त था जहाँ भारतीय संगीत बहुत कुछ अपने यथार्थ रूप में विद्यमान था ।

• मराठा वीर होने के साथ – साथ संगीत प्रेमी भी होते थे । इनको वीर व भक्ति रस का संगीत अधिक प्रिय था । इसी कारण मराठा सितार को अपेक्षा वीणा , मृदंग , दुन्दुभि आदि का प्रयोग करते थे । ये लोग ख्याल व कव्वाली के स्थान पर ध्रुपद शैली को अधिक पसन्द करते थे । इन लोगों में भजन अधिक प्रचलित थे । उत्तर की अपेक्षा महाराष्ट्र में इस समय संगीत का स्तर उच्च था । जनसामान्य में भी संगीत का शास्त्रीय रूप प्रचलित था ।

• बहादुरशाह जफर बहुत ही संगीतानुरागी थे । वह एक कुशल संगीतज्ञ थे । गालिब जैसा विश्वविख्यात शायर उनके ही दरबार में था । वह मुगल वंश के अन्तिम बादशाह थे । इनके दरबारी गायक तानरस खाँ थे ।

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• संगीत सम्बन्धी अनेक ग्रन्थ इस दौरान लिखे गए । अहोबल के ‘ संगीत पारिजात ‘ से प्रेरणा लेकर वीणा के खुले तार पर 7 शुद्ध व विकृत स्वरों को स्थापित किया ।

• वीणा के तार की लम्बाई 36 ” स्वीकार की । तंजौर के राजा तुलाजीराव ने ‘ संगीत सारामृत ‘ नामक पुस्तक की रचना की । 19 वीं का आविष्कार किया । शताब्दी के उत्तरार्द्ध में प्यार खाँ ने सुरशृंगार नामक एक सुन्दर वा

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• इस समय तक यहाँ राग – रागनियों का अधिक प्रचलन हुआ , जिसके अन्तर्गत शिव मत , कृष्ण मत , भरत मत , हनुमान मत , सोमेश्वर मत कल्लिनाथ मत आदि अनेक मत प्रचलित हो गए थे । शास्त्रीय संगीत की अपेक्षा सुगम संगीत अधिक प्रचलित हो गया था । यद्यपि ख्याल का आविष्कार अमीर खुसरो ने किया था । इस काल में ठमरी शैली का प्रचलन अधिक हो गया था । ठुमरी चंचल प्रकृति की होने के कारण शृंगार रस प्रधान रागों में गाई जाती थी ।

• अंग्रेजों के अत्यधिक प्रभाव के कारण रियासतों में पनपने वाल संगीत भी आश्रयहीन हो गया था । भारतीय शासकों एवं जनता पर अंग्रेजी सभ्यता की छाप पड़ने लगी थी ।

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• शासक वर्ग की उदासीनता के कारण संगीत निम्न श्रेणी के व्यवसायी लोगों की धरोहर बन गया था , इसी कारण हिन्दू समाज के कुलीन घरों के लोग भी संगीत को हेय दृष्टि से देखने लगे थे संगीत की पवित्रता क्षीण हो चुकी थी यह मात्र भोग विलास की । वस्तु हो गई थी ।

• यूरोपीय शिक्षा प्राप्त कर युवक – युवतियों ने भारतीय संगीत की अवहेलना कर यूरोपियन संगीत को अपनाने का प्रयास किया । ये भारतीय संगीत का मजाक उड़ाते थे तथा पाश्चात्य , संगीत जोकि उनकी समझ से बाहर था उसकी प्रशंसा करना अपनी शान समझते थे , परन्तु भारतीय शासकों एवं जनता का सम्बन्ध तो भारतीय संगीत से ही था । अतः विशेष अवसरों व उत्सवों पर भारतीय संगीत का ही आयोजन होता था ।

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• गायन में ग्वालियर घराना , दिल्ली घराना , पटियाला घराना , किराना घराना , आगरा घराना आदि प्रमुख थे । सितार में बीनकारों या जयपुर घराना , सरोदिया घराना , उस्ताद इनायत खाँ का घराना प्रसिद्ध था तथा तबले में दिल्ली , अजराड़ा , बनारस , लखनऊ , फर्रूखाबाद , पंजाबी बाज अधिक प्रसिद्ध थे । ये घराने वर्तमान समय में भी कुछ अंश में विद्यमान हैं ।

• ब्रिटिश काल में घरानों की प्रथा अधिक बलवती हो गई थी । इन घरानों के कारण उस समय भारतीय संगीत कुछ अंश तक सुरक्षित रहा । इस परम्परा ने भारतीय संगीत की व्यापकता , उत्कृष्टता , पवित्रता एवं आत्मिक सुषमा का हास किया ।

” दक्षिण भारतीय संगीत कला का इतिहास ” यह हिन्दुस्तानी संगीत के ऐतिहासिक विकास का अध्ययन का आठवां अध्याय था , आगे बने रहें सप्त स्वर ज्ञान के साथ । धन्यवाद , हाँ इसे अपने मित्रों के साथ शेयर करना, साथ ही साथ सब्सक्राइब करना न भूलें ।

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