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Swarlipi Paddhati Notation System क्या है, किसे कहते हैं, किसने प्रचलित किया?

Swarlipi Paddhati / Notation System / स्वरलिपि पद्धति

Swarlipi Paddhati / Notation System / स्वरलिपि पद्धति ) की शुरुआत और इसका विकास कैसे हुआ ? Swarlipi Paddhati / Notation System / स्वरलिपि पद्धति in Indian Classical Music – 2 महानुभावों ने भारतीय शास्त्रीय संगीत को लिखकर संरक्षित करने की जरूरत को समझा । सैंकड़ो सालों से यह गुरुमुख से शिक्षा ग्रहण करके अगले पीढ़ी तक हस्तानांतरित होता रहा था । अंततः अपने अथक प्रयास के बाद इन्होने स्वरलिपि पद्धति की रचना कर दी । उनके नाम हैं – पंडित विष्णु नारायण भातखंडे और पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर । उन दोनों की स्वरलिपि पद्धतियां है –

संगीत संरक्षण आखिर क्यों आवश्यक ???

क्या आप सारे गाने ,भजन जो भी आपको पसंद है याद रख सकते हैं ? कितने सालों तक ? क्या सदा के लिए ?

हम गीत को स्वरलिपि पद्धति से इस प्रकार से संरक्षण या संकलित कर सकते हैं । जो कि आगे आने वाली पीढ़ियों के लिए, आगे के समय में कभी भी उस स्वरलिपि पद्धति ( Swarlipi Paddhati / Notation System ) को देख कर उस गीत को या गत को गाया और बजाया जा सके।

एक साधारण या आम आदमी जब किसी भी गीत को सुनता है । चाहे वह उसको गायक के कंठ से सुने या उसको किसी वाद्य यंत्र के वादन से । वह उस संगीत को सुनता है तो उससे एक प्रश्न उसके मस्तिष्क में आता है ,कि किस प्रकार से वह इस गीत को न्याय संगत याद रखता है ।

कोई कलाकार उन गीतों को कैसे याद रखता है चाहे वह 2 महीने के बाद गाया या बजाया जाये या 2 साल के बाद गाया या बजाया जाए । कई वर्षों के बाद कैसे वह उसको याद रख सकता है जबकि एक साधारण तौर पर कहा जाए तो यह असंभव / इनपॉसिबल है ।

तो यहां पर इस समस्या का हल है – स्वरलिपि पद्धति ( Swarlipi Paddhati / Notation System ) जो इस कार्य को बहुत ही आसान बना देती है।

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स्वरलिपि पद्धति (Swarlipi Paddhati / Notation System ) किसे कहते हैं ? इसका अर्थ क्या है ?

ऊपर विषयसूची में आप देख सकते हैं हम कितनी विस्तार से इसे समझने वाले हैं ।

स्वरलिपि पद्धति (Swarlipi Paddhati / Notation System ) किसे कहते हैं ?

हम सब बात करते हैं स्वरलिपि की तो स्वर लिपि का अर्थ है स्वरों की लिपि । लिपि का अर्थ है लेखन। तो स्वरों के द्वारा जब लेखन किया जाए । यह इसका शाब्दिक अर्थ है । स्वरलिपि जिससे कि गीत का या गत का लेखन किया जाए।
एक तरह से कह सकते हैं कि किसी भी गीत या वाद्य पर जो भी बजाए जाने वाली गत है उसको जब स्वर और ताल के साथ लिखा जाता है तो हम उसे स्वरलिपि पद्धति ( Swarlipi Padhati / Notation System ) कहते हैं।

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संगीत में गत किसे कहते हैं ?

सरल शब्दों में – जब वाद्य (Musical Instrument) पर कोई भी चीज बजायी जाती है उसे गत कहते हैं ।

संगीत में बंदिश किसे कहते हैं ?

जब हम कोई बंदिश गाते हैं तो उसको गीत कहते हैं। शास्त्रीय संगीत में गीत को बंदिश कहा जाता है । और उपशास्त्रीय संगीत में उसको हम कहते हैं ठुमरी, दादरा, कजरी इत्यादि। उसके बोल ही उसके बंदिशें हैं ।

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लाइट म्यूजिक का क्या अर्थ है?

लाइट म्यूजिक को हम सुगम संगीत भी कहते हैं। यह सीखने में शास्त्रीय संगीत के मुकाबले आसान होती है।

सुगम संगीत किसे कहते हैं ?

हम जब सुगम संगीत की बात करते हैं तो गीत, फिल्म संगीत ,गजल और भजनों की बात करते हैं । सुगम संगीत में जिन शब्दों के प्रयोग होते हैं वे बहुत ही सरल भाषा में बंधे होते हैं , जिसे आम लोग जल्द ही समझ जाते हैं और शब्दों के अनुसार जब संगीतकार इसके सुर बांधते हैं तब ये संगीत में परिवर्तित हो जाते हैं ।

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इसके अलावा चित्रपट संगीत है सभी में स्वरलिपि एक बहुत ही महत्वपूर्ण विषय है। अंग्रेजी में इसको  Notation System कहते हैं । यानी इस पद्धति को हम स्वरलिपि पद्धति ( Swarlipi Paddhati / Notation System ) कहते हैं ।

भारतीय शास्त्रीय संगीत में स्वरलिपि पद्धति ( Swarlipi Paddhati / Notation System )

हम जहां तक संगीत की बात करते हैं तो हमारा विषय भारतीय शास्त्रीय संगीत से जुड़ा हुआ है। उसमें स्वरलिपि पद्धति बहुत ही आवश्यक है चाहे वह दक्षिण भारतीय शास्त्रीय संगीत की पद्धति कहलाए या हम वेस्टर्न म्यूजिक की बात करें सभी जगह स्वरलिपि अपनाई जाती है। संगीत को संग्रहित करने के लिए ।

तो नाम उसके अलग-अलग हो सकते हैं – जैसे कि हम वेस्टर्न म्यूजिक बात करें तो अंग्रेजी में उसे हम Swarlipi Paddhati Notation System कहेंगे – यह वह है जिसे देखते हुए या जिसको पढ़कर या जानकर western संगीत की जो बारीकियां हैं उसे गाया या बजाया जा सके ।

चित्रपट संगीत और स्वरलिपि पद्धति  Notation System

चित्रपट संगीत की बात करते हैं,अक्सर आपने देखा होगा कि कोई भी गायक स्टेज पर या यूट्यूब वीडियो पर या कहीं पर गा रहा होता है तो उसके सामने स्टैंड पर एक डायरी या पन्ने लगे होते हैं जिसको देखकर वह गाता है। अक्सर इस प्रकार का आपने जरूर कहीं देखा ही होगा ।

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कुछ पन्ने रखे हों या कोई डायरी रखी हों या कोई कॉपी रखे, कलाकार उसको देखते देखते गा रहा है या कलाकार उसको देखकर वादन कर रहा है अपने वाद्य पर तो यहां पर वह चीज उसकी एक लिपि है उसकी Swarlipi Paddhati / Notation System है ।

जिसे Swarlipi Paddhati / Notation System का ज्ञान हो, उसको देखकर उसे सहज ही उन स्वरों का, उस ताल का ज्ञान हो जाता है और वह उसको अनुसरण करते हुए गाता है या बजाता है ।

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Swarlipi Paddhati / Notation System का स्वरूप

आज हम Swarlipi Paddhati / Notation System के थोड़े से इतिहास को देखें तो हमें बहुत अधिक इसके बारे में नहीं मिलता । हम बहुत प्राचीन संगीत की बात करते हैं वहां पर इसका बहुत ही कम विवरण है या हम कहें तो इसका बहुत ही धीमा विकास उस वक़्त पे रहा ।

इसके धीमे विकास के क्या कारण रहे हैं ? बात है कि इस विषय का स्वरूप प्रैक्टिकल स्वरूप है । संगीत की जहां तक हम बात करें तो संगीत तो गाने, बजाने से संबंधित है । हालांकि “संगीत रत्नाकर” में भी कहा गया कि गायन, वादन और नृत्य इन तीनों का जो संबंध है वह संगीत कहा गया है

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अगर प्रैक्टिकल स्वरुप की बात करें तो क्रियात्मक रूप होने की वजह से इसका हर चीज जो भी हम कह रहे हैं, जो भी हम गा रहे हैं वह उसके क्रियात्मक पक्ष ( Practical ) के रूप में लिया जाता है ।

थ्योरी / संगीत के शास्त्र पक्ष की बात करें तो वो भी उसके क्रियात्मक पक्ष ( Practical ) पर आधारित है ।

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हमें प्राचीन काल में ” सामवेद ” से भारतीय संगीत का वर्णन मिलता है तो यह क्योंकि उसका ज़िक्र बहुत कम या ना के बराबर है ? Swarlipi Paddhati Staff Notation के बारे में क्यों इतनी उदासीनता रही ?

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इसका एक बहुत बड़ा कारण है कि गुरु मुख से सीख कर यहां पर शिक्षा ग्रहण की जाती है ।

गुरु मुख से शिक्षा ग्रहण का कारण

शुरू से ही यह पद्धति रही जिसमें कि गुरु के मुख से यानि गुरु जो प्रस्तुति / प्रैक्टिकल परफॉर्म करके बताता है शिष्य उसको सुनता है और उसको समझता है, आत्मसात करता है और फिर उसका अभ्यास करता है । इस प्रकार से शिक्षा ग्रहण की जाती है । इसके कई कारण हैं –

पहला कारण :-

आज का जो समय है जिस प्रकार से आज लेखन प्रणाली और मुद्रण प्रणाली विकसित है वह उस समय इतनी विकसित नहीं थी। जो आज साइंस और टेक्नोलॉजी है इतनी विकसित हो गई है कि कोई भी चीज है ,कोई भी गीत है , संगीत का कोई भी प्रकार है उसको उसी वक्त save कर लिया जाता है ,उसकी नोटेशन Notation उसी वक्त बन जाती है। और उसे संजो लिया जाता है भविष्य के लिए ।

Swarlipi Paddhati Notation System को देखते हुए कभी भी, किसी भी समय, कोई भी कलाकार, कोई भी विद्यार्थी वह गीत क्या कह रहा है, किस प्रकार के स्वरों को वह समाए हुए हैं, किस ताल में बद्ध है वह किस प्रकार से प्रयोग होता है उसका प्रैक्टिकल उसका पूरा साचा विद्यार्थी को समझ में आ जाता है।

एक और महत्वपूर्ण कारण रहा वह है हमारी शास्त्रीय संगीत पद्धति

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रागदारी पद्धति व शास्त्रीय संगीत पद्धति

दूसरा कारण :-

इसके बाद जो महत्वपूर्ण कारण रहा वह यह है कि हमारी शास्त्रीय संगीत पद्धति है वो रागदारी पद्धति है जोकि रागों पर राग रागिनी पर आधारित है । आप अक्सर सुनते हैं या जब आप शास्त्रीय संगीत की बात करें तो रागों की बात कहना स्वभाविक है। और इन रागों की जो शिक्षा है वो जैसे मैंने पहले कहा के गुरु के द्वारा वह विद्यार्थियों को शिष्यों को दी जाती रही है ।

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गुरु या हम कहें उस्ताद वह अपने शिष्यों को या अपने शागिर्दों को जब तैयार करता था तो उनको सीना ब सीना तालीम देता था सीना सीना तालीम का मतलब है कि आमने-सामने बैठकर शिक्षा देना। तो विद्यार्थी या शिष्य गुरु को घंटों सुनता था । गुरु के पास शिक्षा लेने के लिए उसके पास रहता भी था। एक लगातार उसके गुरु से उसका संबंध बना रहता था । जिससे गुरु शिष्य को जो भी शिक्षा देना चाहता है वह उसको एक बराबर, एक लय/ कंटिन्यूटी के साथ देता था ।

एक कारण रहा है कि संगीत में सुनना बहुत जरूरी है

तीसरा कारण :-

यह भी एक कारण रहा है कि जैसे संगीत में अक्सर कहा जाता है कि संगीत में सुनना बहुत जरूरी है ।

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जैसा कि आजकल हमारे पास बहुत से रिकॉर्डिंग उपलब्ध है। youtube भरा हुआ है, internet भरा हुआ है लेकिन फिर भी गुरु की आवश्यकता क्यों होती है ? चाहे हम कहे कि गुरु को हम इंस्टिट्यूट पर देखें, स्कूल में देखें, प्राइवेट जो लोग सिखाते हैं उनको देखे, जो घरानेदार परंपरा में गुरु शिष्य परंपरा के अंतर्गत तालीम देते हैं उनमें देखें। सभी में आमने-सामने बैठकर शिक्षा देने को ही पहली प्राथमिकता दी जाती है ।

गुरु शिष्य परंपरा

गुरु शिष्य परंपरा क्या है?

पुराने समय में तो शिक्षण की पद्धति का यही एक तरीका था । लोग दूर-दूर से आकर गुरुओं से तालीम लेते थे। गुरु अपने पुत्रों को अपने अन्य शागिर्द को या जो खास विशेष शिष्य होते थे उन सभी को सामने बैठाकर सिखाता है । गुरु जो वह सिखाना चाह रहा है उसको अपने गले से अपने कंठ से या अपने वाद्य के आधार पर निकालकर वह शिष्य को बताता है ।

शिष्य गुरु का अनुसरण करता था और अनुसरण करते वक्त गुरु यह देखता था कि शिष्य इसमें कोई चीज गलत तो नहीं कर रहा, कहीं पर वह गलत तरीके से स्वर संवाद तो नहीं कर रहा और वहीं पर उसको टोका जाता था।
आज भी यह गुरु शिष्य परंपरा विश्वविद्यालयों में या विद्यालयों में या गुरु से अलग तरीके से तालीम ली जाती है।

विद्यार्थी शिक्षक के पास जाकर इसी चीज को/इसी परंपरा को अपना रहे हैं । शिक्षक पहले उसको गा बजा कर बताते हैं और शिष्य उसका अनुकरण करता है । उसको समझाया जाता है कि ऐसा क्यों है और उस को आत्मसात करके शिष्य अपने तालीम को ग्रहण करता है । उसके बाद अपनी समझ या अपने चिंतन से उस को आगे बढ़ाता है । संछेप में दिख्या, सिख्या, परिख्या ।

दिख्या, सिख्या, परिख्या

इसीलिए कहते हैं दिख्या, सिख्या, परिख्या कि पहले गुरु की जो तालीम है उसको देखा फिर उसको सीखा फिर उसको परखा यानि अपनी बुद्धि का भी इस्तेमाल किया ।

अगर उस समय ऐसा होता रहा तो ऐसा क्यों ? तो एक बहुत जरूरी बिंदु पर कहूंगा कि क्यों स्वरलिपि पद्धति यहां पर बहुत धीरे विकसित हुई क्योंकि वहां पर कोई इतनी अधिक आवश्यकता उसको नहीं पड़ी ।

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गुरु की बात – निरंतर अभ्यास

एक और बात जो मैं यहां पर कहना चाहूंगा वह यह है कि पुराने समय में लोग जो इस क्षेत्र में बहुत बड़े दिग्गज माने जाते थे, गुरु माने जाते थे । वह कहते थे ” बंदिश को लौटना ” । बंदिश लौटना का मतलब है कि बार-बार बंदिश को गाते रहना या गत को बजाते रहना , जिससे कि वह भूले नहीं।

धयान रहे उस समय कोई टेप रिकॉर्डर, मोबाइल इत्यादि नहीं थे। जैसे आज कल मोबाइल पर भी अपनी चीजों को रिकॉर्ड कर लेते हैं तो इस प्रकार से प्रिजर्व करने के इतने संसाधन नहीं थे । बार बार उसको अभ्यास करते रहते थे उसको लौटना कहते थे , बंदिशों को लौटना, रागों को लौटना कहते थे ।

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एक राग में अनेकों बंदिश होती थी किस प्रकार से उसको याद करेंगे । इस प्रकार से बंदिशों को लौटा जाता था, बार-बार उसको गाया बजाया जाता था । जिससे कि उनके जहन में वह बिल्कुल तरोताजा रहे वह राग और उससे संबंधित गत ।

तो यह भी एक कारण था कि शायद इसे इस प्रकार से इतना महत्वपूर्ण नहीं समझा गया होगा । स्वरलिपि पर इतना ध्यान नहीं दिया गया होगा।

Swarlipi Paddhati / Notation System की शुरुआत

स्वरलिपि का इतिहास काफी पुराना रहा है । लगभग 250 ईस्वी पूर्व पाणिनि के समय स्वरलिपि की शुरुआत रही होगी। स्वर लिपि का विकास उस समय इसलिए भी नहीं हुआ क्योंकि उस समय जो स्वरलिपि थी उससे यह पता तो चलता था की पूरे गीत में कौन से स्वरों का प्रयोग है। लेकिन यह पता नहीं चल पाता था कि उसमे कोमल है या तीव्र है, कितने कोमल है कितने तीव्र हैं या उसमें किस प्रकार से कण इस्तेमाल हो रहा है, या उसमे मींड है या उसमें गमक का इस्तेमाल हो रहा है यह पता नहीं हो पाता था इसलिए हम कह सकते हैं उस समय यह बहुत शुरुआती दौर पर रही होगी।

धीरे-धीरे जब हमारी शास्त्रीय संगीत की प्रणाली विकसित हुई तो यह गुरु मुख से ही आगे बढ़ी । लेकिन बाद में इसमें यह कमी महसूस होने लगी कि इसको किसी प्रकार से संभाला जाए या संरक्षित किया जाए तो शायद यह संगीत आगे की पीढ़ी के लिए बहुत ही लाभदायक रहेगा ।

तो आगे की पीढ़ी के लिए कोई भी चीज धरोहर की तरह संभाल कर रखी जाए तो उसको कैसे रखा जाए ? ये एक प्रश्न था और यहां पर इसका उत्तर सिर्फ एक था कि किसी प्रकार से स्वरलिपि पद्धति  Notation System  पर जोर दिया जाए उसको आगे बढ़ाया जाए।

और यह काम इन 2 महानुभाव ने कर दिया ।

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भारतीय स्वरलिपि पद्धति ( Swarlipi Paddhati / Notation System ) के 2 महानुभाव

स्वरलिपि पद्धति ( Swarlipi Paddhati / Notation System ) की अगर हम बात करते हैं आज के समय में तो इसे आगे बढ़ाने में उत्तर भारतीय शास्त्रीय संगीत में दो दिग्गजों का नाम आता है- तो है पंडित विष्णु नारायण भातखंडे जी का और दूसरा नाम आता है पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर जी का ।

इनके बारे में विस्तार से जानिये इस लेख के सबसे नीचे Link दिया हुआ है ।

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Vishnu Digambar Paluskar Biography / जीवनी in Hindi

पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर जी की हम बात करें तो ये ग्वालियर घराने से संबंधित रहे हैं । इनकी स्वरलिपि पद्धति आज भी हम देखे तो महाराष्ट्र की तरफ या ग्वालियर की तरफ इस परंपरा को फॉलो करते हैं। दिल्ली में कहीं या और भी जगह पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर जी की जो परंपरा है उसको फॉलो करते हैं । लोग आज भी इसी स्वरलिपि पद्धति को अपने संगीत में या अपने गायन वादन में इसका प्रयोग करते हैं ।

विष्णु नारायण भातखंडे जीवनी / Biography in Hindi

जहां तक हम पंडित विष्णु नारायण भातखंडे जी की बात करें तो उनकी जो स्वरलिपि पद्धति है उसका भी बखूबी प्रयोग आज के समय में है । उन्होंने जो बंदिशों को कलेक्शन किया है उसमें इसी स्वरलिपि पद्धति को प्रयोग बखूबी किया जा रहा है । हम यदि उनकी पुस्तकों को देख लें तो ।

दोनों पद्धति की बात करूँ तो उसमे भारतीय शास्त्रीय संगीत की जो दोनों पद्धति है उसे आज भी हम उनके समय में जो बंदिशें थी या जिन बंदिशों का उन्होंने निर्माण किया, उनका संग्रह किया, उनसब में हम इन्ही स्वरलिपि पद्धति को पाते हैं ।

हम जहाँ बात करें शास्त्र पक्ष की तो शास्त्र पक्ष को भी समझने में इस स्वरलिपि पद्धति का प्रयोग बखूबी हो रहा है । ये पहले भी होता रहा और आगे भी होता रहेगा ।

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Conclusion / निष्कर्ष –

इन्होंने स्वरलिपि पद्धति Swarlipi Paddhati / Notation System ) की रचना की जो बहुत सरल रही । इसके बाद अपने परंपरा में अपने शिष्यों को बताया और पूरे भारतवर्ष में प्रचारित किया। यह ऐसा प्रचार रहा कि उस समय से आज तक ये उतना ही महत्वपूर्ण विषय है । भारतीय शास्त्रीय संगीत में उस समय यह पद्धति बहुत ही सहायक रहा और आगे की जनरेशन/ पीढ़ी के लिए भी यह स्वरलिपि पद्धति उतनी ही सहायक है और आगे भी रहेगी ।

यह दो ऐसी महान विभूतियां हुए जिन्होंने बहुत सा योगदान भारतीय संगीत में दिया है जिसके लिए आज भी हम उनके ऋणी हैं और भविष्य में भी संगीत जगत उनका ऋणी रहेगा ।

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पंडित विष्णु नारायण भातखंडे जी और पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर जी की Swarlipi Paddhati / Notation System के बारे में भी जानिये

साथ ही जुड़े रहें हमारे साथ संगीत के इस सफर में । इस लेख में अभी तक बने रहने के लिए आपका हृदय से धन्यवाद ।

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