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Vishnu Digambar Paluskar Biography / जीवनी in Hindi

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बालक Vishnu Digambar Paluskar – Biography

Vishnu Digambar Paluskar Biography – पं. विष्णु दिगम्बर पलुस्कर का जन्म रियासत कुरुन्दवाड़ जिला बेलगांव में श्रावण पूर्णिमा 1872 ई . के दिन हुआ था । इनके पिता का नाम दिगम्बर गोपाल तथा माता का नाम श्रीमती गंगादेवी था । बचपन के एक दुर्घटना के कारण इनकी नेत्र ज्योति क्षीण हो गई , जिसके कारण इनको स्कूली शिक्षा से हाथ धोना पड़ा । इनके पिता ने इनकी संगीत – विषयक शिक्षा के लिए इन्हें मिरज भेज दिया । मिरज रियासत के आश्रय में एक प्रसिद्ध गायक बालकृष्ण बुआ इचलकरंजीकर रहते थे । उनकी छत्रछाया में बालक विष्णु की संगीत शिक्षा प्रारम्भ हुई । लगभग ग्यारह वर्ष निरन्तर साधना करने के पश्चात् यह एक सिद्ध और कुशल कलाकार बन गये । कंठ संगीत इनका मुख्य विषय था और ख्याल गायन इनकी मुख्य शैली ।

पन्द्रह वर्ष की अवस्था में इनका विवाह श्रीमती रमाबाई के साथ हो गया । इनके बारह बच्चे हुए जिनमें अब एक भी जीवित नहीं हैं । कुछ वर्ष पूर्व इनके प्रतिभाशाली पुत्र जिनका नाम पं . दत्तात्रेय विष्णु पलुस्कर था । आप संगीत के क्षेत्र में एक सितारे की तरह चमक रहे थे और अपने सरस तथा मधुर संगीत से संगीत – प्रेमियों का मन मोह रहे थे कि उनका भी देहान्त हो गया ।

संगीत में योगदान तथा महाविद्यालय की स्थापना

विष्णु दिगम्बर पलुस्कर का संगीत में योगदान सन् 1896 ई . में पं . विष्णु दिगम्बरजी अपने गुरुजी से विदा लेकर भ्रमण के लिए निकल पड़े तथा अपने संगीत से जनता को मन्त्र – मुग्ध कर लिया । पलुस्करजी ने जिन स्थानों में अपने संगीत का प्रदर्शन किया उनमें से बड़ौदा , ग्वालियर , दिल्ली , रावलपिण्डी , भरतपुर , हैदराबाद ( सिंध ) , अहमदाबाद , नवदीप , पूना , बम्बई , इलाहाबाद , वर्मा , नेपाल , काशी आदि मुख्य हैं ।

5 मई , 1901 ई . को इन्होंने लाहौर में गान्धर्व महाविद्यालय नामक संगीत की शिक्षा देने वाली संस्था की स्थापना की लाहौर में रहकर इन्होंने संगीत की पत्रिका निकाली । विद्यार्थियों के लिए अनेक पाठ्य – पुस्तकों का निर्माण किया । लाहौर में विद्यालय की आर्थिक दशा ठीक नहीं थी तथा विद्यालय में विद्यार्थियों की संख्या भी कुछ अधिक नहीं थी । इन्हीं सब कारणों को ध्यान में रखकर 1908 में इन्होंने बम्बई में ‘ गान्धर्व महाविद्यालय ‘ की स्थापना की और उसके लिए एक भवन बनवाया ।

इन्होंने अब तक की सम्पूर्ण कमाई इस संस्था को समर्पित कर दी । विद्यालय के लिए किराए पर एक मकान लिया , कुछ सामान और वाद्य – यन्त्र इकट्ठे किए . किन्तु आर्थिक कठिनाई के कारण विद्यालय सुचारु रूप से नहीं चल पाया । बीच – बीच में संगीत विद्यालय के लिए धन एकत्रित करने के लिए पण्डितजी बाहर दौरे पर भी जाते थे । 1923 में एक आर्थिक झंझावात के कारण यह विद्यालय भी बन्द हो गया ।

इस संस्था के बन्द हो जाने के बाद पंडितजी संसार से विरक्त हो गये । भक्ति का अंकुर जो उन्हें अपनी पैतृक सम्पत्ति के रूप में प्राप्त हुआ था , वह पल्लवित और उचित हो उठा । रामनाम के कीर्तन के साथ पण्डिजी के हृदय ही तंत्री बज उठी ।

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आदर्श गुरु

विष्णु दिगम्बर पलुस्कर जी एक महान् गायक होने के साथ – साथ एक आदर्श गुरु के रूप में भी हमारे सामने आते हैं । ये अपने साथ शिष्यों की मण्डली रखते थे । उनको शिक्षा देने और जीवन में एक सफल व्यक्ति बनाने में एक आदर्श पिता के समान अपना कर्त्तव्य समझते थे । उसी के परिणामस्वरूप देश के महान् कलाकारों की वृद्धि हुई । उनमें से मुख्य संगीत मार्तन्ड पं. ओंकारनाथ ठाकुर , प्रयाग संगीत समिति के भूतपूर्व संचालक स्व . प्रो.बी.ए. कशालकर , पण्डित नारायण व्यास , पण्डित विनायकराव पटवर्धन , श्री बी.आर. देवधर तथा श्री वी.ए. ठकार आदि हैं ।

स्वरलिपि पद्धत्ति

पलुस्करजी ने एक अत्यन्त सम्पूर्ण और वैज्ञानिक स्वरलिपि – पद्धत्ति का भी निर्माण किया । वह स्वरलिपि पद्धत्ति आज उत्तर भारत में अत्यन्त प्रसिद्ध और मान्य पद्धति है । पण्डितजी ने गीतों में से शृंगार सम्बन्धी शब्दों को हटाकर भक्ति – रस को स्थान दिया । इनके गीतों में भक्ति रस का ही प्रभाव नहीं रहा , उनके अनेक गीतों में राष्ट्रीय भावना भी पायी जाती है । राष्ट्रीय महासभा के वार्षिक अधिवेशनों पर | वे विशेष रूप से निमंत्रित किए जाते थे ।

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पण्डितजी ने गीत में से शृंगार और अश्लीलता निकालकर उसके शुद्ध राग – रागिनियों द्वारा भक्ति रस को लोकप्रिय बनाया , संगीत के प्रति यह उनकी एक महान् सेवा है ।

पुस्तकों की रचना

संगीत के विषय में अनेक पुस्तकें लिखकर क्रमबद्ध और प्रमाणभूत संगीत साहित्य का भी आपने निर्माण किया । इन्होंने संगीत की लगभग 50 पुस्तकों की रचना कर उन्हें प्रकाशित किया , जिनमें ‘ संगीत – बालप्रकाश ‘ आदि के नाम उल्लेखनीय हैं । जो आज संगीत के लिए एक धरोहर के रूप में समझे जाते हैं । इनकी अधिकतर पुस्तकें धार्मिक भावनाओं से ओतप्रोत हैं । आपने जनसाधारण में संगीत – ज्ञान की वृद्धि के लिए ‘ संगीतामृत – प्रवाह ‘ मासिक पत्र भी निकाला था ।

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क्रियात्मक संगीत का सूक्ष्म और पूर्ण – लिपिबद्ध स्वरूप जो इनकी पुस्तकों में मिलता है , वह भारतीय संगीत में   अद्वितीय है । इन्होंने काला को नैतिकता के साथ सम्बद्ध करने का सफल प्रयत्न किया । मुगलकालीन विलासिता के रंग में रंगे हुए कुरुचिपूर्ण गीतों का कलेवर , बदलकर सूर , मीरा , तुलसी आदि भक्त कवियों की रचनाओं को शास्त्रीय संगीत की गायन – शैली में लाकर सभ्य समाज में संगीत के प्रति एक महान आस्था स्थापित कर दी ।

इन्होंने ध्रुपद , धमार , तराने की रचनाएँ की और पाश्चात्य स्वरलिपि के आधार पर नयी स्वर लिपि की रचना की । संगीत के कई विद्यालयों की स्थापना की , जिनमें ‘ गांधर्व महाविद्यालय – मण्डल ‘ अब विकसित होकर एक महान् संगीत – संस्था के रूप में संगीत की सेवा कर रहा है . इनकी शाखाएं भारत में फैली हुई हैं , जिनके द्वारा हजारों विद्यार्थी संगीत – ज्ञान प्राप्त कर रहे हैं ।

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धार्मिक प्रवृत्ति

पलुस्करजी की जीवन के अन्तिम काल में धार्मिक प्रवृत्ति और अधिक जाग्रत हो गयी थी , और आपने नासिक में | 1925 में ‘ राम – नाम आधार ‘ नामक एक आश्रम की स्थापना की । इन्होंने रामभक्ति के आधार पर देश में संगीत के प्रति एक पवित्र वातावरण स्थापित कर दिया । आगे चलकर बम्बई के विद्यालय को प्रमुख केन्द्र बनाया गया ।

पण्डितजी के गीतों में भक्ति – रस का प्रभाव था । वे सदैव राम – भक्ति में लीन रहा करते थे । ” रघुपति राघव राजा राम ” उनका प्रिय कीर्तन था । राम – भक्ति के अतिरिक्त उनके हृदय में राष्ट्रीय भावनाएं भी ओत – प्रोत थीं । वे प्राय : अपने शियों के साथ राष्ट्रीय सभाओं में राष्ट्रीय गान गाया करते थे ।

पण्डितजी की शिक्षा- प्रणाली बहुत सुन्दर थी । वे अपने शिष्यों से संगीत वार्ताएं करते थे , जिससे इनके शिष्य नयी – नयी खोज कर सकें । पंण्डिजी के लगभग 100 शिष्य निकले, जिनमें से कुछ तो भारतीय संगीत के उच्च कलाकार है , बाकी शिष्य अध्यापन द्वारा भारत के भिन्न – भिन्न शहरों में संगीत का प्रचार कर रहे हैं ।

जीवन के अन्तिम समय Vishnu Digambar Paluskar Biography

पलुस्कर जी को 1930 ई . में लकवा का प्रभाव हो गया और उससे वे अस्वस्थ रहने लगे । 21 अगस्त सन् 1931 . में शरीर त्याग दिया । उनकी स्मृति में ‘ गान्धर्व महाविद्यालय मण्डल ‘ की स्थापना की गयी , जिसमें संगीत का एक पाठ्यक्रम तैयार किया गया और उत्तीर्ण विद्यार्थियों को उपाधियां प्रदान करने का आयोजन किया जाता है । इसका मुख्या केंद्र आज भी बम्बई है तथा भिन्न – भिन्न नगरों में संगीत के विद्यालयों में इसके पाठ्यक्रम का अभ्यास कराया जाता है । पण्डितजी की स्मृति में प्रत्येक वर्ष अनेक नगरों में उनकी पुण्य – तिथि पर उत्सव तथा कार्यक्रम प्रस्तुत किये जाते हैं । आपकी संगीत सेवायें तथा देन इतनी अधिक हैं कि उन्हें कभी भी भुलाया नहीं जा सकता है । 

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Vishnu Digambar Paluskar Biography  / जीवन परिचय में बस इतना ही , आगे भी बने रहें सप्त स्वर ज्ञान के साथ , आपका धन्यवाद ।

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