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विष्णु नारायण भातखंडे स्वरलिपि पद्धति क्या है ? Bhatkhande Swarlipi के चिन्ह ?

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विष्णु नारायण भातखंडे स्वरलिपि पद्धति

विष्णु नारायण भातखंडे स्वरलिपि पद्धति – भातखंडे जी जिन्हें चतुर पंडित के रूप में भी जाना जाता है । इन्होंने भारतीय शास्त्रीय संगीत में बहुत बड़ा योगदान दिया है । उन्होंने जगह-जगह भ्रमण करके पूरे उत्तर भारत में अलग-अलग घरानों के लोगों के पास जाकर, उनसे मिलकर उन्होंने उन घरानों के शास्त्र पक्ष / म्यूजिक थ्योरी है और क्रियात्मक पक्ष / प्रैक्टिकल म्यूजिक है , दोनों पक्षों के ज्ञान को आत्मसात करके तथा उसे लिखकर या लिपिबद्ध करके रखा/ संरक्षित किया और आज भी उनकी पुस्तकें हमें उपलब्ध है।

इस लेख में हम जानेंगे – Vishnu Narayan Bhatkhande Swarlipi Paddhati में स्वरों का वर्गीकरण ? सप्तक के चिन्ह ? मन्द्र , मध्य , तार सप्तक क्या है ? अति मन्द्र, अति मध्य, अति तार सप्तक क्या है ? इसके अलावे स्वर के प्रकार ? और जानेंगे कि शुद्ध स्वर , कोमल स्वर , तीव्र स्वर , विकृत स्वर कितने होते हैं ?

क्रियात्मक संगीत / Practical Music 

हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत पद्धति या हम क्रियात्मक पक्ष को ले तो, क्रमिक पुस्तक मालिका इसकी 6 वॉल्यूम आज भी उपलब्ध है । हम सभी विद्यार्थी व शिक्षक गण या कोई जो किसी भी घराने से संबंधित है वह सभी इन पुस्तकों का इस्तेमाल करते हैं अपने शिक्षण में । और जब आप इन पुस्तकों को खोल कर देखेंगे तो जो भी चिन्ह मैं आपको बताने जा रहा हूं वह सभी उस में प्रयोग किए जाते हैं।

सप्तक के 7 स्वरों का वर्गीकरण ( विष्णु नारायण भातखंडे स्वरलिपि पद्धति द्वारा )

स्वर के भाग

स्वर को 2 भागों में बांटा गया है

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1. शुद्ध स्वर

शुद्ध स्वर की अगर हम बात करें तो पंडित विष्णु नारायण भातखंडे जी ने शुद्ध स्वर के लिए कोई भी चिन्ह नहीं दिया । जब हम सा, रे, ग, म, प, ध, नि, का इस्तेमाल करते हैं तो हम शुद्ध स्वर का प्रयोग कर रहे होते हैं । तो शुद्ध स्वरों में सिर्फ सा, रे, ग, म, प, ध, नि, इस प्रकार से ही लिखा जाएगा । उसे किसी प्रकार की कोई चिन्ह नहीं दिया जाएगा ।

2. विकृत स्वर

जैसे कि मैंने पहले की परंपरा में बताया लेकिन रे, ग, ध, नि और म यह 5 स्वर हैं । यह विकृत स्वर या चल स्वर कहलाते हैं जोकि अपने स्थान को बदलते रहते हैं । इन 5 स्वर में रे ग ध नि यह स्वर अपने स्थान पर मिलेंगे तो वह शुद्ध कहलाएंगे अन्यथा वह अपने स्थान से थोड़ा सा नीचे को चले जाते हैं । जब ये अपने स्थान से थोड़ा नीचे की ओर चले जाते हैं तब उन्हें हम कहते हैं कि यह कोमल हो जाते हैं ।

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इन स्वरों के लिए कहा जाए तो, जब हम इन स्वरों को लिखित या लिपिबद्ध करें तो आप कैसे पहचानोगे कि यह स्वर कोमल है? उत्तर – जब हम स्वर के नीचे लेटी रेखा देखेंगे तो हम समझेंगे कि यह कोमल स्वर है ।

विकृत स्वर के भाग

विकृत स्वर को 2 भागों में बांटा गया है

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1. कोमल स्वर

अब आगे चलते हैं कोमल स्वर की बात करें कोमल स्वर कि जब हम बात करें तो कोमल स्वर में पंडित भातखंडे जी ने स्वरों के नीचे लेटी हुई एक रेखा दी है । एक चिन्ह के रूप में उसे कोमल बताने के लिए । लेटी हुई रेखा – जब रे, ग, ध, नि के नीचे हम लेटी हुई रेखा देखते हैं तो हम समझेंगे की यह कोमल स्वर है ।

सा और प के नीचे हम ऐसी रेखा नहीं देखते हैं । इसका मतलब सा और प दोनों शुद्ध स्वर हैं । इस सा और प को हम अचल स्वर भी कहते हैं । अचल स्वर यानी अपने स्थान को नहीं बदलने वाला ।

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2. तीव्र स्वर

पंडित विष्णु नारायण भातखंडे जी की परंपरा के अनुसार । तीव्र स्वर – तीव्र स्वर की बात करें तो तीव्र स्वर में स्वर के ऊपर खड़ी रेखा दी जाती है । तीव्र स्वर का मतलब है अपने स्थान से थोड़ा ऊपर की ओर उठना। हम अगर सात स्वर की बात करें तो रे, ग, घ, नि कोमल हो जाते हैं वही मध्यम यानी “म” अपने स्थान पर होता है या अपने स्थान से ऊपर की ओर अपना स्थान परिवर्तित करता है । जब वह अपने स्थान से ऊपर की ओर जाता है तो उसे हम कहते हैं तीव्र होना ।

मध्यम स्वर ऐसा है जो या तो शुद्ध या तीव्र होता है । आप नीचे दिए हुए तस्वीर में देख सकते हैं । हम कभी नहीं कहते कि यह कोमल होता है । यह अलग बात है कि संगीतकार गायन,वादन में कहते हैं कि कोमल मध्यम इस्तेमाल कर दो । उस समय उनका अभिप्राय होता है शुद्ध मध्यम । ऐसा कहीं प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए वरना विद्यार्थी कंफ्यूज हो जाएंगे । तीव्र के लिए ऊपर सीधी खड़ी रेखा दिखाई जाती है ।

Note:- जैसा की आप सभी जानते हैं कि संगीत के सात स्वर सा रे गा म प ध नि और पाश्चात्य संगीत के सात स्वर डो रे मी फ सो ला सी है।

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विष्णु नारायण भातखंडे स्वरलिपि पद्धति के चिन्ह (सप्तक)

अब बात आती है सप्तक की मुख्य तीन सप्तक है (मन्द्र, मध्य, तार) सप्तक की

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मुख्य तीन सप्तक – मन्द्र, मध्य, तार


सप्तक के मुख्य चिन्ह ।

note:- जैसा कि हम कोई भी गीत गा रहे हैं, कोई बंदिश गा रहे हैं या कोई गत बाजा रहें हो । उनमें हम इन स्वरों में इस तरह के चिन्हों का प्रयोग नहीं करते हैं (मन्द्र, मध्य, तार सप्तक में ) तो हमें यह पता ही नहीं चलेगा कि वह कौन से सप्तक के सप्तक का चिन्ह है। यदि सप्तक का पता नहीं चलेगा तो हम उसका जो पक्का स्थान है पता ही नहीं कर पाएंगे । इस प्रकार से जो गायक हैं वह गा नहीं पाएगा और वादक बजा नहीं पाएगा । इसलिए मन्द्र, मध्य और तार सप्तक होना बहुत जरूरी है ।

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अति मंद्र सप्तक

इसके अलावा अति तार सप्तक भी होते हैं अति मंद्र सप्तक भी हैं । यह आप पर निर्भर करता है कि आपकी आवाज कहां तक जाती है या आप जो वादन कर रहे हैं वह कहां तक वादन कर पाते हैं । जैसे हम कहें अति मंद्र सप्तक तो

अति तार सप्तक

विष्णु नारायण भातखंडे परंपरा के अनुसार उसी तरह तार सप्तक की बात करें तो उसके ऊपर एक बिंदी लगी रहती है।


इनकी उपलब्धियां और संगीत में योगदान बहुत सारे हैं । इतने कम शब्दों में इनके उपलब्धियों को बता पाना असंभव है। दोस्तों अभी के लिए इतना ही । आगे इनके बारे में मै और भी जानकारी इस लेख में अपडेट करता रहूंगा । तबतक के लिए बने रहें आगे संगीत के इस सफर में ।


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