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ताल के 10 प्राण क्या हैं ? दस Praan of TaaL

ताल के 10 प्राण

ताल के 10 प्राण – नारद कृत ‘ संगीत मकरन्द ‘ में ताल के 10 प्राण का वर्णन इस प्रकार दिया गया है –

” कालो मार्ग क्रियाअंग ग्रहो जाति कला लया । यति प्रस्तार कश्चयोति ताल प्राणान् दशस्मृता ।। ”

अर्थात् काल , मार्ग , क्रिया , अंग , ग्रह , जाति , कला , लय , यति , प्रस्तार ये ताल के दस प्राण माने जाते हैं । इन ताल के दस प्राणों का प्रयोग प्राचीनकाल में अत्यधिक किया जाता था , परन्तु वर्तमान में इनका प्रयोग कम किया जाता है , जबकि कर्नाटक ताल पद्धति में आज भी इन दस प्राणों का प्रयोग प्रचलित है । ताल के दस प्राण न केवल ताल के सर्जक तत्त्व हैं , बल्कि ताल के रूप सौन्दर्य प्रदान करने में भी अहम भूमिका का निर्वाह करते हैं ।

ताल के दस प्राण10 Praan of TaaL

ताल के इन 10 प्राण का विस्तृत विवरण निम्नलिखित है –

1. काल

1. काल काल का अर्थ है- समय यह अत्यन्त विस्तृत शब्द है । संगीत में जो समय लगता है , उसे काल कहा जाता है । संगीत के क्षेत्र में काल नापने के लिए क्षण , तव , काष्ठ , निमेष , कला चतुर्भाग , लघु एवं गुरु आदि का प्रयोग किया जाता था ।

2. मार्ग

2. मार्ग संगीत में ताल के पथ को मार्ग कहा जाता है । इस प्रकार ताल के प्रारम्भ से अन्त तक की समस्त प्रणाली को मार्ग कहते हैं । ‘ संगीत रत्नाकर ‘ ग्रन्थ में चार मार्गों एवं उनकी विशेषताओं का वर्णन पं . शारंगदेव ने इस प्रकार किया है

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” मार्गाः स्युस्तत्र चत्वारो ध्रुवक्षिचत्रश्रय वार्तिकः ।।

दक्षिणश्रयेति तत्र स्याद ध्रुव के मात्रिक कला ।

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शेषेषु द्वे चतस्त्रौष्टौ क्रमान्मात्रा कला भवेत् ।। ”

अर्थात् ध्रुव , चित्र , वार्तिक और दक्षिण चार मार्ग माने गए हैं तथा इनके अनुसार ताल का मार्ग निम्न प्रकार है ।

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• ध्रुव मार्ग 1 मात्रिक कला आघात के साथ ; जैसे —1 + ।

• चित्र मार्ग द्विमात्रिक कला , 1 मात्रा पर आघात , दूसरी मात्रा पर खाली ; जैसे- 1 , 21

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• वार्तिक मार्ग चतुमात्रिक कला , 1 मात्रा पर आघात और शेष तीन मात्राओं पर खाली ; जैसे – 1 , 2 , 3

• दक्षिण मार्ग अष्टमात्रिक कला पहली मात्रा पर आघात तथा शेष अन्य मात्राएँ खाली ; जैसे – 1 , 2 , 3 , 4 , 5 , 6 , 7 , 8

3. क्रिया

3. क्रिया संगीत में काल के गिनने के क्रम को क्रिया कहते हैं । संगीत में हाथ से कई प्रकार की क्रिया की जाती हैं , जैसे- हाथ पर आघात करके ताली या दाहिने हाथ को झुकाकर मात्रा गिनना , ये सब क्रिया के अन्तर्गत ही आते हैं ।। क्रिया मुख्यतः दो प्रकार की होती हैं , जैसे –

( 1 ) सशब्द क्रिया में ताल की मात्राओं की गिनती करते समय आवाज की जाती है या ताली लगाई जाती है ।

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( ii ) निःशब्द क्रिया में दाहिने हाथ को एक ओर झुकाकर फेंक कर या मन ही मन में गिनने अर्थात बिना ताली के उँगलियों पर गिनने की क्रिया निःशब्द क्रिया कहलाती है ।

• वर्तमान समय में ताली व खाली दिखाना , सम पर ताली मारना आदि सभी कुछ ताल की क्रियाओं के अन्तर्गत आता है । ताल की इन्हीं शब्द व निःशब्द क्रियाओं से ताल का रूप व मात्राओं का स्थान सुगमता से पहचाना जाता है ।

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4. अंग

4. अंग ताल के समय में जो अलग – अलग भाग होते हैं , वे ‘ अंग ‘ कहलाते हैं । अंग में वर्णों का समय तथा मात्राएँ निर्धारित की जाती हैं । अंग छः होते हैं इनके नाम अंग , चिह्न एवं मात्रा निम्न प्रकार हैं ।

हुन लघु PRE 0 1 S 3 + @ 2 4 8 12 16 प्लुत

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अंगचिह्नमात्रा
अणु द्रुतU1
द्रुत 02
लघु 14
गुरुS8
प्लुत312
काकपद+16
6 अंग के नाम, चिह्न एवं मात्रा

• ये मात्रा चिह्न दक्षिणी ताल पद्धति में प्रचलित है ।

• उत्तरी ताल पद्धति में प्रत्येक ताल की मात्राओं की गिनती ताल बोल तथा चिह्न लगाते हुए प्रत्येक ताल के 3 अंग या चरणों में लिखा जाता है ।

• प्राचीनकाल में 108 वालों में सभी 6 अंगों का प्रयोग किया जाता परन्तु आधुनिक ताल पद्धति में केवल प्रथम तीन अंगों का प्रयोग किया । कर्नाटक ताल पद्धति में इन्ही चिह्नों द्वारा ताल में अंग प्रदर्श किए जाते हैं ; जैसे – तीन ताल का चिह्न है | S | तथा इसके अनुसार तीन ताल की मात्रा 4 , 8 , 4 है ।

5. ग्रह

5. ग्रह – ताल को जिस मात्रा से गोत या गत प्रारम्भ होता है , उसे कहते हैं । गीत या गत का प्रारम्भ ताल को किसी भी मात्रा से किया जाता है ।

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ग्रह के चार प्रकार होते हैं ।

  1. सम ग्रह– जब गीत तथा ताल एक ही स्थान से आरम्भ हो , तो उसे सम ग्रह कहते हैं ।
  2. विषम ग्रह– जब गोत का प्रारम्भ ताल वगीत की प्रथम से न होकर अन्य किसी मात्रा से होता है , तो उसे विषम कहते हैं ।
  3. अतीत ग्रह समय का अन्त होने पर जब गाना प्रारम्भ किए । जाता है , तो उसे अतीत ग्रह कहते हैं ।
  4. अनागत ग्रह– अनागत का अर्थ है- आने वाला अ मुख्य समय आने के पूर्व ही जब गीत प्रारम्भ हो जाए , तो उसे अनागत ग्रह कहते हैं अर्थात् पहले गाना शुरू हो बाद में ताल प्रारम्भ हो । सम ग्रह में समाप्त होने पर ‘ समावर्तन ‘ अतीत ग्रह में समाप्त होने पर अधिकावर्तन ‘ एवं अनागत में समाप्त होने पर ‘ हीनावर्तन ‘ होता था ।

6. जाति

6. जाति – जाति से ही कर्नाटक पद्धति के तालों का निर्माण होता है , ल की मात्राएँ इन्हीं जातियों के अनुरूप बदलती रहती है । बोलो की रचना जितने जितने अक्षरों से हुई है , उसी के अनुरूप 5 जातियाँ विकसित हुई है , जो निम्न प्रकार है । ( i ) चतस्त्र- चार मात्राएं लघु की ( ii ) तिस्त्र– तीन मात्राएँ लघु की ( iii ) मिश्र – पाँच मात्राएँ लघु की ( iv ) खण्ड– सात मात्राएँ लघु की ( v ) संकीर्ण – नौ मात्राएँ लघु की

7. कला

7. कला – ताल में काल की इकाई को कला कहा जाता है । कला शब्द का अर्थ है अवयव इस अवयव को मात्रा कहते हैं । इसी मात्रा के आधार पर ही विभागों का निर्माण किया जाता है । सशब्द एक निशब्द क्रिया भी मात्रा या कला पर आधारित है । इसलिए कला के अन्तर्गत विभाग , मात्रा और क्रिया का प्रयोग किया जाता है । दक्षिणात्य तालों में एक कल , द्विकल और चतुष्कल आदि तालों के भेद कला के आधार पर बनाए गए हैं ।

8. लय

8. लय – ताल की गति को लय कहते हैं । प्रायः यह गति अलग – अल होती है अतः लय भी अलग – अलग होती है । संगीत में लय के मुख्य तीन प्रकार हैं , जो निम्न प्रकार है । ( i ) विलम्बित लय– यह सब बहुत धीमी होती है तथा इसकी प्रकृति गम्भीर होती है । इसमें बड़ा ख्याल , धूपद , धमार मसीतखानी गत का प्रयोग होता है । ( ii ) मध्य लय– इसकी प्रकृति सामान्य होती है । यह न तो बहुत तेज और न ही बहुत धीमी होती है । यह मध्य लय होती है , जिसमें छोटे ख्याल व रजाखनी गत का प्रयोग किया जाता है । ( iii ) द्रुत लय– यह चंचल प्रकृति की लय है । इसकी गति तीव्र होती है । इसमें झाले तथा तराने आदि बजाए जाते हैं ।

9. यति

9. यति – लय के चाल क्रम एवं प्रयोग विधि को यति कहा जाता है । इसके मुख्यत पाँच प्रकार होते हैं ।

( i ) समा- मध्य एवं अन्त में समान लय से विशिष्ट क्रियाविधि को समा यति कहा जाता है । ( ii ) स्रोतोगता विलम्बित , मध्य में मध्य और अन्त में द्रुत लय से विशिष्ट क्रियाविधि को स्रोतोगता यति कहते हैं । ( ( iii ) गोपुच्छा इसके द्रुत , मध्य में मध्य और अन्त में विलम्बित लय से विशिष्ट क्रियाविधि को गोपुच्छा यति कहते हैं । ( iv ) मृदंगा इसके आरम्भ में तथा अन्त में द्रुत लय , बीच में मध्य लय हो वह मृदंगा यति कहलाता है । v ) पिपीलिका इसके अन्त में विलम्बित लय हो तथा बीच में द्रुत लय हो , तो वह पिपीलिका यति कहलाती है ।

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10. प्रस्तार

10. प्रस्तार किसी ताल के एक आवर्तन को बजाने के पश्चात् उस ताल के बोलों को भिन्न रूपों में विकसित करने को प्रस्तार कहा जाता है । इसके अन्तर्गत कायदा , टुकड़ा , पल्टा , रेला , पेशकारा , आदि सम्मिलित पाया जाता है ।

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