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संगीत शैली के प्रकार- Music Genre (Sangeet Shaili) ke prakar

संगीत शैली के प्रकार

संगीत शैली के प्रकार – जिस तरह गायन शैली के कुछ प्रकार होते हैं , उसी तरह आज के इस आधुनिक युग में कुछ शब्द , कुछ तरीके , बजने का ढंग या यूँ कह ले कुछ शैलियां हैं । आप इससे बेसक वाकिफ होंगे पर इस अध्याय में आप विस्तार से जान पाओगे की ये शैलियां कौन – कौन सी है । संगीत शैली को हम अंग्रेजी में Music Genre कहेंगे ।

संगीत शैली के प्रकार ? Sangeet Shaili ke prakar ?

संगीत शैली के प्रकार कितने हैं ?

संगीत की कुछ प्रमुख शैलियाँ निम्नलिखित हैं –
रीमिक्स संगीत – Remix Music
फ्यूजन संगीत शैली- Fusion
वाद्यवृन्द ( Orchestra / ऑरकेस्ट्रा )
वृन्दगान ( क्वायर / Choir / Chorus)
ध्वनिकी सभागृह ( Auditorium )

रीमिक्स संगीत – Remix Music

रीमिक्स (Remix ) समकालीन नृत्य संगीत में आदर्श बन गया है । यह कला में एक विषय पर विभिन्न दृष्टिकोण रखता है । वर्तमान में इण्टरनेट व प्रौद्योगिकी ने सहायता से कला में रीमिक्स किया जा सकता है । इस प्रकार रीमिक्स नृत्य संगीत की प्रमुख वर्तमान गायन शैली है । यह शैली एक गीत को अलग – अलग संगीत शैलियों या नृत्य स्थानों में प्रदर्शन करने में महत्वपूर्ण योगदान देती है । इस गायन शैली का हिप – हॉप और पॉप संगीत में व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है ।

अतः हम कह सकते हैं कि कुछ नया बनाने के लिए अन्य सामग्रियों को विनियोजित और परिवर्तित करना ही ‘ रीमिक्स ‘ है ।

रीमिक्स का विकास

रीमिक्स का विकास 19 वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में रिकॉर्डेड साउण्ड की शुरुआत के बाद से प्रौद्योगिकी ने लोगों को सामान्य सुनने के अनुभव को फिर से व्यवस्थित करने में सक्षम किया है । 1940 और 1950 के दशक में आसानों से सम्पादन योग्य चुम्बकीय टेप के आगमन और मल्टीट्रैक रिकॉर्डिंग के बाद के विकास के साथ , इस तरह के परिवर्तन अधिक होने लगे । उन दशकों में ‘ मस्करी कॉन्सर्ट की प्रायोगिक शैली ने ध्वनि रचनाएँ बनाने के लिए टेप – हेर फेर ( अर्थात आगे – पीछे ) का उपयोग किया जाता था ।

आधुनिक रीमिक्सिग की जड़े 1960-1970 के दशक में डांस हॉल संस्कृति के रूप में विकसित हुई । इसके बाद रीमिक्स संगीत का तरल विकास स्के , रॉकस्टेडी , रेगे और डब / डबिंग के रूप में हुआ । 1970 के दशक में ह डिस्कोथके डीजे डिस्को गाने ( लूप्स टेप व एडिट्स का उपयोग करके ) फर्श पर नर्तकियों को लाने और उन्हें वहाँ रखने के लिए समान चाले चला रहे थे । ये प्रयास ( आँकड़ा ) टॉम मौलटन का था जिन्होंने नृत्य रीमिक्स का आविष्कार किया था ।

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1960 के दशक में मौलटन ने डांस क्लब के लिक्होममेड मिक्स टेप बनाकर अपने इस रीमिक्स फेरियर की शुरुआत की । ये टेप अतः लोकप्रिय हो गए और उन्होंने न्यूयॉर्क शहर में संगीत उद्योग जगत में मौलटन को डांस ओरिएण्टेड रिकॉर्डिंग के सौन्दर्य शास्त्र में सुधार करने के लिए आमन्त्रित किया गया ।

साल्सोल रिकॉर्ड्स में मौलटन , गिबन्स और उनके समकालीन ( जिम बगैस , टी स्कॉट और बाद में लैरी लेवन और शेप पेटी बोन आदि ) डिस्को युग के लिए रीमिक्सर्स के सबसे प्रभावशाली समूह सिद्ध हुए । यूके और यूरोप में salsoul कैट लॉग को डिस्को मिक्सर के लिए कैनन के रूप में देखा जाता है ।

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1970 के दशक में डिस्को करने के लिए , डब और डिस्कोरीमिक्स संस्कृतियों ने जमैका के आप्रवासियों के माध्यम से ब्रोकस से मुलाकात की और हिप – हॉप संगीत बनाने में सहायता की । इस तरह कटिंग ( कुछ – कुछ हटाना व जोड़ना ) और स्क्रैचिंग रीमिक्स संगीत का हिस्सा बन गया ।

संगीत शैली के प्रकार में इस प्रकार की शैली रीमिक्स की पहली मुख्य धारा की सफलताओं में से एक हवीं हैनकॉक द्वारा वर्ष 1983 का ‘ टैक रॉकिट ‘ था जैसा कि अँड मिक्सर , डी.एस.टी. द्वारा रीमिक्स किया गया था । संगीत में इस प्रकार का प्रयोग रीमिक्स कला के सभी प्रकार में किया जा सकता है ।

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समकालीन उपयोग में एक पेरोडी , हास्य , व्यंग्य या विडम्बनापूर्ण नकल के माध्यम से एक मूल काम करने , मजाक बनाने , टिप्पणी करने आदि के लिए रोमिक्स की रचना की जा सकती है । अतः रीमिक्स कला का साहित्य से लेकर एनीमेशन तक सभी कला और संस्कृति में प्रयोग किया जा सकता है । संगीत में तो विशेष रूप से रोमिक्स का प्रयोग किया जा रहा है जिससे हम टी.वी. , रेडियो , रंगमंच सभी पर देख सकते हैं ।

रीमिक्स की विशेषताएँ

संगीत शैली के प्रकार रीमिक्स की विशेषताएँ – रीमिक्स गायन शैली की प्रमुख विशेषताएं इस प्रकार है , जिसमें इसके कारणो उद्देश्यों को भी समाहित किया जाता है –

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रेडियो या नाइट क्लब प्ले के लिए एक गीत को अनुकूलित या संशोधित करना ।

• एक गीत को स्टोरियो या साउण्ड सहित जोरदार बनाना ।

• एक पुराने गीत को नए रूप में प्रस्तुत करना । एक विशिष्ट संगीत शैली या रेडियो प्रारूप के रूप गाने को बदलने हेतु गायन को ढालना ।

• यह सम्मान सामग्रियों की सहायता से गीत को अलग अंदाज में दर्शकों तक पहुँचता है ।

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• यह समान सामग्रियों की सहायता से गीत का अलग अन्दाज में दर्शक पहुंचाता है ।

• यह गीत के कलात्मक शैली के उद्देश्यों को बदलता है ।

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• यह छाट कलाकार तथा सफल बड़े कलाकार के मध्य सम्बन्ध बनान सहायक होता है ।

• यह शैली सामान्यतः एक पेशेवर गायक को उत्पन्न करती है । यह एक गीत को वैकल्पिक संस्करण प्रदान करती है ।

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• यह गायन शैली मूल गाँव की शैली में सुधार को नए रूप में प्रस्तुत करती है ।

रीमिक्स की वर्तमान उपयोगिता

रीमिक्स की वर्तमान उपयोगिता 19 वीं सदी के उत्तरार्द्ध में रिकॉर्डिंग साउण्ड की शुरुआत के साथ ही की शैलियों का विकास प्रारम्भ हुआ ।

वर्तमान समय में प्रौद्योगिकी व इण्टरनेट के रोमिक्स की माँग को बढ़ाया कला में इसके कई पेरौडी पाए जाते हैं , जिसमें हास्य व्यंग्य , नकल , टिप्प जैसे प्रमुख घटक शामिल होते हैं ।

इस प्रकार वर्तमान में रीमिक्स संगीत ने ए परम्परागत संस्कृति को बढ़ावा दिया है और नवीन वातावरण तैयार किया है । मीडिया और इण्टरनेट ने कला को सार्वजनिक कर उसको मूल शैली के को परिवर्तित कर प्रस्तुत किया है । वर्तमान में युवाओं में ऐसी गायन शैल हो मांग है ।

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फ्यूजन संगीत शैलीFusion

फ्यूजन संगीत शैली – फ्यूजन एक संगीत शैली है , जिसे ‘ जैज फ्यूजन ‘ भी कहा जाता है । जैज और रॉक म्यूजिक, फंक आदि के संयोजन से इसका विकास हुआ है । इसमें Rock n Roll में इलेक्ट्रॉनिक गिटार , एम्पलीफायर और की बोर्ड के उपयोग में शैली का विस्तार हुआ । इसमें तुरही और सैक्सोफोन जैसे पीतल और वुडबिड औजार का प्रयोग होता है ।

जैज फ्यूजन बैंड में पियानों को उपयोग को सम्भावना कम होती है , वही इलेक्ट्रॉनिक गिटार , सिंथेसाइजर और वास का उपयोग करने की सम्भावना अधिक होती है ।

इसमें राग के प्रयोग के लिए विभिन्न खांचे बनाए गए होते हैं । साथ ही इसमें लोग विस्तृत राग प्रगति , अपरम्परागत समय या प्रति धुनों के लिए विशेष का साथ – साथ उपयोग किया जाता है ।

भारतीय फ्यूजन संगीत व विकास

फ्यूजन भारतीय संगीत की प्रमुख शैली है । ऐसा माना जाता है कि वर्ष 1955 में संयुक्त राज्य अमेरिका मे अली अकबर खान के प्रदर्शन से फ्यूजन संगीतक चलन शुरू हुआ था । भारतीय संगीत में यह वर्ष 1960 से 1970 के दशक में रॉक एंड रोल फ्यूजन के साथ अस्तित्व में आया , किन्तु यह प्रारम्भ में तथा उत्तरी अमेरिका तक सीमित था ।

भारतीय संगीत का मंच कुछ समय सितार वादक पण्डित रविशंकर द्वारा सँभाला गया था । पण्डित रविशंकर ने जैज संगीतज्ञ ब्रड शेक के साथ मिलकर भारतीय परम्पराओं को मिलाकर जैज फ्यूजन संगीत शुरू किया ।

वर्ष 1965 में जॉर्ज हैरसिन ने सितार पर नाजियन गाना बजाया । इसके ही प्रसिद्ध वेब विशेषज्ञ माइल्स डेविस ने बालकृष्ण बिहारी शर्मा बादल राय के साथ मिलकर प्रदर्शन किया । इसके अतिरिक्त प्रेटफूल स्टिंग बैंड , रोलिंग स्पेन्स आदि ने भी भारतीय प्रभाव एकीकृत कर फ्यूजन संगीत की प्रवृत्ति को विकसित किया ।

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वर्ष 1970 में जॉन मेक्लालिन के महाविष्णु आरकेस्ट्रा ने निष्ठा व प्रामाणिकता के महत्वपूर्ण लोगों ने साथ फ्यूजन का पीछा किया , जिसमें जॉन एल शंकर तथा जाकिर हुसैन जैसे महत्वपूर्ण लोगों का साथ दिया ।

वर्ष 1980 के दशक के उत्तरार्द्ध में भारतीय ब्रिटिश कलाकारों में संलयन की भारतीय पश्चिमी परम्परा को जोड़ा । भारत में या बाहर के कलाकारों ने फिल्मों से प्रेरणा ली है और भारतीय कलाकारों के साथ काम किया है ।

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वाद्यवृन्द ( Orchestra / ऑरकेस्ट्रा )

वाद्यवृन्द ( ऑरकेस्ट्रा ) वृन्दावादन और अंग्रेजी में ‘ ऑरकेस्ट्रा ‘ कहा जाता है । इसे दक्षिण में ‘ वाद्य कचहरी / instrumental Court कहा आता है । नाट्यशास्त्र में भरत ने वृन्द विशेष को कुतुप की मज्ञा दी है । इसमें कहा गया है कि शोभा यात्रा , मंगल कार्य और युद्ध के अवसरों पर एकांकी वादन का प्रयोग किया जाता था । वाद्यवृन्द के निर्देशक को ‘ कुशीलव ‘ कहा जाता था , जिसे वाद्यों के वादन तथा प्रयोग का ज्ञान होता था ।

भारत के प्राचीन समय से ही मांगलिक व आदि कार्यों के अवसर पर शंख , घण्टा डमरू , थाली , मँजीरा , मृदंग , नागाड़ा , शहनाई आदि का प्रयोग होता है । पानी काल में वाद्यवृन्द के लिए ‘ तूर्प ‘ शब्द का प्रयोग किया जाता था । इस समय भी विभिन्न अवसरों पर अलग – अलग वाद्यों का प्रयोग किया जाता था । जिन्हें कुतुप, तटकुतुप, अवनद्ध कुतुप आदि कहा जाता था ।

वाद्यवृन्द को मुगल काल में ‘ नौबत ‘ और बाद में ‘ वाद्य भाण्ड ‘ कहा जाने लगा ।

वर्तमान में वाद्यवृन्द

वर्तमान में वाद्यवृन्द के विकास में उस्ताद अलाउद्दीन खाँ का नाम ( प्रथम ) भारतीय बैण्ड ‘ मैहर ‘ के संस्थापक ) विष्णु दास शिराली , पण्डित रविशंकर , लालमणि मिश्र , जुबीन मेहता , विजय राघव राव आदि का बहुत योगदान रहा है । इस प्रकार वाद्यवृन्द या ऑरकेस्ट्रा वाद्यों की ऐसी भाषा है , जो एकता और सामाजिक भावना का सन्देश देती है ।

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ऑरकेस्ट्रा की उपयोगिता व महत्त्व

वाद्यवृन्द मे शास्त्रीय अर्द्धशास्त्रीय तथा लोक धुनों पर आधारित रचनाएँ प्रस्तुत की जाती है । कथात्मक भावनात्मक रचनाएँ भी इसमें प्रस्तुत की जाती हैं । वृन्द के विकास के वृहत् स्वरूप को ‘ सिम्फनी ‘ कहा जाता है । इसमें सैकड़ों बादक मिलकर रचना को प्रस्तुत करते हैं तथा भावो की अभिव्यक्ति को व्यक्त करते हैं ।

वर्तमान में इसकी उपयोगिता के सामाजिक व सांस्कृतिक एकता को स्थापित करने तथा व्यापक बनाने में किया जाता जिसमें इसकी महत्ता झलकती है ।

वृन्दगान ( क्वायर / Choir / Chorus)

भारत में प्राचीनकाल से ही वृन्दगान या समूह गान की प्रथा रही है , जिसे अंग्रेजी में कोरस ‘ और ‘ क्वायर ‘ कहा जाता है । यह शब्द मूलतः यूनानी है । यूनानी भाषा में इस शब्द का प्रयोग संगीतयुक्त ऐसे धार्मिक नृत्यों के लिए होता था , जो विशेष अवसरों अथवा त्योहारों पर किए जाते थे ।

शास्त्रीय संगीत में वृन्दगान की परम्परा प्राचीनकाल से ही रही है । ब्राह्मणों द्वारा मन्त्रों का सामूहिक उच्चारण , देवालय में सामूहिक प्रार्थना , भजन अथवा लोक में विभिन्न अवसरों पर गाए जाने वाले लोकगीत समूहगान पर समवेत गान के अन्तर्गत आते हैं तथा सभी वृन्दगानों का विषय प्रायः राष्ट्रीय , सामाजिक अथवा सांस्कृतिक होता है । पारस्परिक एकता , ए के प्रति प्रेम और समाज की गौरवशाली परम्पराओं का उद्घोष वृन्दगाने के द्वारा ही सिद्ध होता है ।

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इस प्रकार गायक और वादकों द्वारा सामूहिक रूप से जो संगीत प्रस्तुत किया जाता है । उसे ‘ वृन्दगान ‘ कहा जाता है । भारत के नाट्यशास्त्र में तीन प्रकार के वृन्द का उल्लेख किया गया है , जो निम्नलिखित है

यदि वृन्द मे उत्तमवृन्द की अपेक्षा भी कलाकारों की संख्या अधिक हो तो उस वृन्द को कोलाहल कहा जाता है । प्रत्येक वृन्द में गान की एकरूपता आवश्यक होती है और सभी कलाकार एक – दूसरे को वृन्दगान की प्रकृति और रचना के अनुसार सहारा देते हुए भव्य संगीत की सृष्टि करते हैं ।

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वृन्दगान की स्वर रचना और कलाकारों का चयन उत्सव की प्रकृति तथा अवसर की उपयोगिता को ध्यान में रखते हुए किया जाता है , जिससे उत्सव को बेहतर बनाया सके । वृन्दगान- रचना के मुख्य बच्चों में निम्नलिखित को शामिल किया जाता है- साहित्यिक तत्त्व सांगीतिक तत्त्व , श्रेणी विभाजन ( अपिंग ) एवं संचालन निर्देशन ) ।

ध्वनिकी

ध्वनिकी विज्ञान की वह शाखा है , जिसके अन्तर्गत ध्वनि तरंगों , अपश्रव्य तरंगो एवं पराश्रव्य तरंगों का सभी माध्यमों में होने वाली सभी प्रकार की यान्त्रिक तरंगों का अध्ययन किया जाता है । जब आवाज को दृष्टि से हम किसी खुले या बन्द स्थान पर विचार करते हैं तो यह विषय ध्वनि से सम्बन्धित उस शास्त्र की ओर हमारा ध्यान आकर्षित करता है , जिसे ‘ भवन ध्वनिकी ‘ कहा जाता है ।

ध्वनिकी क्या है ?

इसका अपना अलग शास्त्र है जिसमें ध्वनि की लहरों / तरंगों के साथ भवन को दीवारों और वायुमण्डल के सम्पर्क का विज्ञान उदित होता है । इस सम्बन्ध में कुछ लोगों का मानना है कि ऐसी धारणा का केवल पाश्चात्य जगत में विचार किया गया है ।

हड़प्पा और मोहनजोदड़ो जैसी अनेक खुदाइयों के आधार पर हम यह कह सकते हैं कि प्राचीनकाल में भारत में भी यह विज्ञान पूर्ण रूप से विकसित भा तथा उसी के आधार पर मठ , मन्दिर , गुफाओं , भवनो या मकानों , तालाबों , चहारदीवारियों , गुम्बदों , मुख्य द्वारो ‘ नायगृह सभा मण्डपो , पाठशालाओं इत्यादि का निर्माण किया जाता था ।

सभागृह ( Auditorium )

नाट्यशास्त्र के अनुसार तीन प्रकार के सभागृह बताए गए हैं विकृष्ठ , ( Rectangular ) चतुरस्त्र ( Square ) और त्रयस्त्र ( Triangular ) । जिन्हें ‘ अवर ‘ नाम से भी सम्बोधित किया गया है । सभागृह , ‘ ज्येष्ट ‘ , ‘ मध्य ‘ प्रेक्षागृह नाट्यशास्त्र या रंगशाला उस स्थान को कहा गया है , जहाँ कोई सभा आयोजित की जाए या क्रीड़ाओ को प्रदर्शित करने वाले कार्यक्रम आयोजित किए जाएँ ।

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अभिनवगुप्त के अनुसार ज्येष्ठ सभागृह को ऐसे नाटकों के लिए प्रयुक्त किया जाना चाहिए जिसमे नायक – नायिकाएँ दैवीय गुणसम्पन्न हो । मध्य सभागृह में राजाओ से सम्बन्धित नायक और अवर में साधारण नायक – नायिकाएं भाग लेते हैं । वर्तमान के ध्वनिकी विज्ञान की आवश्यकतानुसार तो नहीं , किन्तु ध्वनि के प्रक्षेपण की दृष्टि से प्राचीन सभागृह के निर्माण में पूरा ध्यान रखा जाता था ताकि प्रत्येक श्रोता का स्पष्ट सुनाई दे सके । इसका प्रत्यक्ष प्रमाण आधुनिककालीन मुम्बई का टाटा दियेटर है जिसे अमेरिकन आर्किटेक्चर द्वारा इस प्रकार तैयार किया गया है जहाँ ध्वनि विस्तारक यन्त्र नहीं लगाने पड़ते और मंच के कार्यक्रम की ध्वनि पूरे सभागृह में अन्तिम श्रोता तक स्पष्ट रूप से पहुँचती है ।

आधुनिक युग में अमेरिका के द्वारा 1895 से 1922 तक अनुसन्धान करके भवन ध्वनिकी सिद्धान्त में कुछ नए संशोधन किए गए हैं , जिन्हें ज्यामितिक ध्वनि किरणों का सिद्धान्त ( Geometric Acoustics Ray Theory ) कहते हैं ।

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सॉबिन ने किसी सभागृह में ध्वनि से उत्पन्न होने वाली प्रतिध्वनि की प्रक्रिया , सभागृह का आकारमान तथा उस स्थल की ध्वनि शोषण करने वाली सामग्री तथा उसकी क्षमता , इन तीनों के पारस्परिक सम्बन्ध को प्रतिस्थापित करने में सफलता प्राप्त की है । सॉबिन के अनुसार , किसी सभागृह की श्रवण कसौटी उस सभागृह में उत्पन्न होने वाली प्रतिध्वनि के काल पर तथा उससे उत्पन्न होने वाली ध्वनि की तीव्रता ( Intensity ) पर निर्भर करती है ।

किसी भवन या सभागृह में जब ध्वनि कण्ठ या लाउडस्पीकर आदि । किसी भी माध्यम से उत्पन्न होती है , तो वह फैलकर दीवारों , छत और जमीन इत्यादि से टकराती है । ध्वनि का कुछ भाग इनके द्वारा शोषित ( Absorb ) कर लिया जाता है और कुछ परावर्तित ( Reflect ) हो जाता है । परावर्तित ध्वनि किरणें या ध्वनि कम्पन उत्पादक के ध्वनि कम्पनों के साथ सभागृह के सभी भागों में घूमने लगते हैं । कुछ ही समय में सभागृह के सभी भागों में ध्वनि की घनता ( Density ) समान हो जाती है । ध्वनि उत्पादक से लगातार ध्वनि चलती रहती है , तो उस सभागृह में ध्वनि की जो तीव्रता ( Intensity ) उत्पन्न होती है , वह तीव्रता खुले मैदान में निकली हुई ध्वनि की तीव्रता से 10 गुना अधिक होती है ।

कुछ समय के बाद सॉबिन के ध्वनिकी सिद्धान्त में कुछ दोष दिखाई देने लगे , तब नया सिद्धान्त सामने आया जिसे ध्वनि तरंग सिद्धान्त ( Acoustics Wave Theory ) कहा जाता है । इस सिद्धान्त के अनुसार सभागृह को एक अनुनादक ( Resonator ) माना जाता है । सभागृह का आकार , ध्वनि की तीव्रता , ध्वनि तरंगों का वेग , स्थिर ध्वनि तरंग अस्थिर या अल्पकालिक ध्वनि तरंग , अन्तर्विरोध , ध्वनि शक्ति का ह्रास , ध्वनि शोषक शक्ति , श्रोताओं की संख्या , कुर्सियों या आसनों की व्यवस्था इत्यादि सभी चीजों का एक – दूसरे से सम्बन्ध स्थापित करके ही आदर्श सभागृह की स्थापना होती है ।

उम्मीद करता हु यह जानकारी आपके लाभप्रद होगी । आगे आने वाले जानकारियों के लिए सब्सक्राइब करें और इस लेख को अपने मित्रों के साथ शेयर करें और बने रहें सप्त स्वर ज्ञान के साथ । धन्यवाद

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