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राग सौन्दर्य और बंदिश सौन्दर्य – सौन्दर्य के आधार तत्व- Raag, Bandish Saundarya

राग सौन्दर्य और बंदिश सौन्दर्य

रागों एवं बंदिशों में निहित सौन्दर्य के आधार तत्व को हमें समझना है । राग में निहित सौन्दर्य को समझने के लिए सर्वप्रथम हमें रागों के विभिन्न स्वरूप, उसके स्वर समूहों तथा उन्हें कई दृष्टि तथा आधार पर समझना होगा । उसके उपरांत ही राग सौन्दर्य और बंदिश सौंदर्य को समझा जा सकता है।

राग सौन्दर्य और बंदिश सौन्दर्य के आधार तत्व

हम जानते हैं कि वर्तमान शास्त्रीय संगीत को हम रागदारी संगीत कहते हैं । दक्षिण भारतीय तथा उत्तर भारतीय दोनों ही संगीत में राग के रूप में जो एक विशेष स्वरूप प्रस्तुत किया जाता है , वह है उस राग में प्रयुक्त होने वाले विशेष स्वर सन्निवेशों के आधार पर राग का विस्तार ।

शास्त्रीय संगीत की अन्य विधा, गायन शैली, ठुमरी ,  टप्पा , धमार , ध्रुवपद आदि जिनमें बंदिश यानी पद आवश्यक नहीं है , उनमें अधिकांश काम उपज पर आधारित रहता है । राग के स्वरूप में विस्तार के लिए स्वरों का फैलाव प्रमुख साधन होता है ।

वर्तमान शास्त्रीय संगीत के प्रदर्शन के आधार पर राग के दो स्वरूप दृष्टिगोचर होते हैं । बंदिश से पूर्व व मध्य में यानी बंदिश प्रारम्भ करने के उपरान्त वह काम जो कि स्वर प्रधान होता है , शब्द प्रधान नहीं ।

प्रदर्शन की दृष्टि से

राग के प्रदर्शन की दृष्टि से – राग के प्रदर्शन का पक्ष कलाकार की निजी धरोहर है । राग के स्वरूप पर उसकी कुछ विशेषताएँ तो रहती ही हैं , किन्तु प्रत्येक कलाकार के गाने की कुछ व्यक्तिगत विशेषताएँ होती हैं जो उसके सम्पूर्ण व्यक्तित्व की देन हैं । कलाकार राग की कल्पना जिस ढंग की करता है उसके अनुसार राग का स्वरूप बदल जाता है । हालांकि राग का मूल आकार एक – सा ही रहता है ।

स्वरों के प्रयोग का ढंग , आवाज की विशेषता , खटके , मुर्की , गमक का प्रयोग , राग के सम्पूर्ण स्वरूप को प्रस्तुत करने का ढंग , शब्द उच्चारण , तालपक्ष , प्रत्येक घराने की कुछ अपनी प्रमुख चीजें , ये सब बातें मिलकर राग के प्रभाव को निश्चित स्वरूप प्रदान करती हैं ।

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इसी कारण किसी एक ही राग को दो अलग व्यक्तियों के द्वारा गाने पर एक ही राग रहने पर भी दोनों के प्रस्तुतिकरण में अवश्य अंतर होता है और उस अंतर के कारण उस राग से उत्पन्न होने वाले प्रभाव में भी अंतर होगा । इसीलिए प्रदर्शन की स्थिति कलाकार की व्यक्तिगत स्थिति है ।

रचना के आधार पर राग सौन्दर्य और बंदिश सौन्दर्य

बंदिश की रचना के आधार पर – संगीत के तीन प्रमुख तत्व हैं – स्वर , ताल और पद । इन्हीं तीनों तत्वों से आज हमारी बंदिश बंधी रहती है । इसलिए बंदिश की रचना की दृष्टि से विचार करने के लिए इन तीनों तत्वों की दृष्टि से विचार करना आवश्यक है –

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स्वर की दृष्टि से – बंदिश का महत्वपूर्ण तत्व स्वर हैं क्योंकि आज का शास्त्रीय संगीत ख्याल प्रधान है और ख्याल में स्वरों का कर्षण होने के कारण ख्याल के स्वर का प्राधान्य है ।

बंदिश छोटी होने के कारण राग का समग्र स्वरूप व्यक्त करने में सक्षम नहीं होती ।

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राग के सम्पूर्ण स्वरूप का एक संक्षिप्त अंश ही उसे कह सकते हैं । राग का स्वरूप संक्षिप्त रूप से जितने अच्छे स्वरों में बद्ध होगा , बंदिश भी उतनी ही बढ़िया होगी ।

पद की दृष्टि से

पद की दृष्टि से – प्राचीन काल में सभी ग्रन्थों में प्रबन्ध के रचयिता को वाग्गेयकार कहा है , और वाग्गेयकार के लिए भाषा व साहित्य से सम्बन्धित गुण होना आवश्यक कहा है ; क्गकि प्रबंध यानी गीत की रचना में शब्द – रचना का अपना महत्व है ।

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बंदिश की रचना के लिए उसका स्वरपक्ष व तालपक्ष ही अनिवार्य नहीं , बल्कि पदपक्ष भी जरूरी है । पद साहित्य जितना श्लिष्ट , मंजा हुआ व ऊंचे स्तर का होगा , उतनी ही बंदिश भी प्रभावशाली होगी । इस संदर्भ में यह भी उल्लेखनीय है कि संगीत जीवन से जुड़ा है और शब्द के माध्यम से ही हम जीवन के विभिन्न पहलुओं को व्यक्त करने में सक्षम होते हैं ।

बंदिश में शब्दों की योजना राग की प्रकृत्ति के अनुरूप ही की जाती है , जैसे – तोड़ी करुणा प्रधान राग है , और वहाँ यदि वीररस के पद की योजना कर दें तो राग स्वरूप ही नष्ट हो जाएगा ; क्योंकि पद की रचना राग के स्वरूप के विरुद्ध हो जाएगी ।

ताल की दृष्टि से

ताल की दृष्टि से – राग की प्रकृति , भाव , शब्द – रचना के अनुरूप ही यदि.ताल का चयन भी किया जाए तो बंदिश अधिक प्रभावोत्पादक होती है । ताल की विषम मात्रा से यदि बंदिश उठे और लय को काटती हुई चले तो उसका एक नया रूप हमारे सामने प्रयुक्त होता है । राग अपने विशिष्ट रूप में तभी सामने आता है । जब उसकी शब्द – रचना के अनुरूप ही उसका तालपक्ष भी हो यानि स्वर , ताल और पद इन तीनों का संतुलन होना चाहिए ।

प्रदर्शन के आधार पर

बंदिश के प्रदर्शन के आधार पर – बंदिश का प्रदर्शन कुछ बातों पर निर्भर है –

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1. आवाज लगाने का ढंग ।

2. बंदिश गाने का ढंग ।

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3. आलाप अंग ।

4.तान पक्ष ।

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5. ताल योजना ।

उपर्युक्त सभी बातों के आधार पर राग सौन्दर्य और बंदिश सौन्दर्य का विस्तार तथा प्रदर्शन किया जा सकता है ।

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