Site icon सप्त स्वर ज्ञान

महाराष्ट्र का लोकसंगीत

महाराष्ट्र का लोकसंगीत

महाराष्ट्र का लोकसंगीत यहाँ के लोकसंगीत में विभिन्न अवसरों पर गाए जाने वाले विभिन्न लोकसंगीत प्रचलित हैं । धान कूटते समय , खेत खलियान में काम करते समय , कपड़े धोते समय तथा श्रावण माह में झूलते समय गीत गाए जाते हैं आदि ।

महाराष्ट्र का लोकसंगीतFolk Music of Maharashtra

महाराष्ट्र का लोकसंगीत / प्रमुख लोकगीत निम्नलिखित प्रकार से है

मंगला गौरी गीत

मंगला गौरी गीत • सावन का महीना त्यौहारों व वर्षा ऋतु के कारण हिन्दुओं में सर्वाधिक महत्त्व रखता है , उल्लास व मादकता का वातावरण जितना इस माह में देखा जाता है , उतना अन्य किसी में नहीं । महाराष्ट्र की स्त्रियाँ सावन के महीने में मंगलागौरी का पूजन करती हुई गीत गाती है ।

• महाराष्ट्र की युवतियाँ मंगलागौरी का पूजन करने के लिए जो गीत गाती उनमें प्रायः निरर्थक काव्य हुआ करते हैं तथा तुकबन्दी करते हुए कुछ भी गाते रहते हैं । कहीं पेशेवर स्त्रियाँ भी गाने वाली मिल जाती है ।

नागपंचमी गीत

नागपंचमी गीत • महाराष्ट्र में नागपंचमी का त्यौहार भी बड़े उत्साह से मनाया जाता है । इस दिन सर्प देवता को दूध पिलाया जाता है एवं उनकी पूजा की जाती है । इस अवसर पर भी स्त्रियाँ गीत गाती हैं ।

मछुआरे व जनजाति गीत

मछुआरे व जनजाति गीत • महाराष्ट्र में नारियल पूर्णिमा का एक प्रसिद्ध त्यौहार है , जिसे मछुआरे विशेष रूप से मनाते हैं । ये लोग इस दिन समुद्र की पूजा करते हैं व उसी दिन से मछली पकड़ना प्रारम्भ कर देते हैं । यह महाराष्ट्र के पश्चिमी किनारे पर देखा जाता है , जिसमें मछुआरे पूजन के साथ लोकगीतों का गायन करते हैं ।

Advertisement

महाराष्ट्र में पाई जाने वाली जनजातियों में ढोली , मिरासी , राणा , लंगा , दमामी इत्यादि हैं । यहाँ पुरुषों के लोकप्रिय वाद्य अलगोजा व बाँसुरी हैं । कस्बों के लोकसंगीत में राग – रागनियों की उप – झलक देखने में आती है । पिछड़ी जातियाँ निर्गुण पद या सबद वाणी गाती हैं । इनकी धुनें शान्ति देने वाली हैं । इनके साथ एकतारा बजता है ।

ढप व डाण्डिया गीत

ढप व डाण्डिया गीत • होली के अवसर पर ढप के साथ गीत व नृत्य चलते रहते हैं । दूसरी ओर गींदड़ व डाण्डियाँ गोलाकार नृत्य करते हैं , जिनमें लोकगीत भी गाए जाते हैं । जागरण में खड़ताल चलती है । यह रात भर होता है । साथ में नृत्य भी होता है । जागरण में धार्मिक प्रकृति के पद गीत गाए जाते हैं । इनमें भी सबद वाणियाँ गाई जाती हैं । सगुण पदों में स्पष्ट रूप से राग गाए जाते हैं , जो लोकसंगीत में नहीं गिने जा सकते । प्रायः विहाग , सौरठ , गौड़सारंग , कालिगड़ा , आसावरी , भैरवी आदि राग गाए जाते हैं ।

Advertisement
Advertisement

• त्यौहार , उत्सवों पर स्त्री समुदाय खूब गीत गाती हैं । यहाँ त्यौहारों में देव पूजा अर्थात् पौराणिक देवी – देवताओं की पूजा का विशेष महत्त्व है । देवी – देवताओं में सर्वाधिक महत्त्व भगवान विनायक की आराधना को दिया गया है । कोई भी शुभ कार्य करने से पूर्व भगवान विनायक की पूजा की जाती है तथा उन्हें विशेष रूप से निमन्त्रित करके उनसे सभी प्रकार की ऋद्धि – सिद्धि की याचना की जाती है ।

लोकगीत क्या है? Lokgeet की परिभाषा, उत्पत्ति, विकास एवं विशेषताएँ

Advertisement

लोकसंगीत की उत्पत्ति , विकास तथा वर्गीकरण- Lok Sangeet / Folk म्यूजिक

Advertisement

Advertisement
Share the Knowledge
Exit mobile version